Gulabo- Sitabo – Movie Review in Hindi (हिंदी)

गुलाबो सीताबो, अमेजन प्राइम पर रिलीज़ हुई २ घंटे लंबी फिल्म। २-३ दृश्यों में पृष्ठभूमि में दिखाया गया गुलाबो -सीताबो कठपुतलीयो के खेल सिवाय फिल्म के शीर्षक का कहानी से संबंध नहीं। फातिमा महल, मिर्ज़ा-बेगम, मिर्ज़ा के महल में बांके बेहाल, बेगम और ग़ुलाम, मिर्ज़ा की बेगम पर अब्दुल फ़िदा, अड़ियल किरायेदार, पुरानी हवेली, मिर्जा-बेगम की प्रेम कहानी, तू-तू-मैं-मैं या इस लहजे के आपके पसंद के अन्य किसीभी शीर्षक के साथ आप यह फिल्म देख सकते हैं। और वह शीर्षक गुलाबो सीताबो के तरह ही कहानी को जंचेगा।

मिर्झा (अमिताभ बच्चन), बांके (आयुष्मान) और ग्यानेश शुक्ला (विजय राज) जैसे सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं द्वारा अभिनीत यह फिल्म. इनके अभिनय के बारे में बात करना सूरज को आइना दिखाने जैसा है। क्रिस्टोफर क्लार्क (बृजेन्द्र काला), गुड्डो (सृष्टि श्रीवास्तव) और अन्य सहकलाकारों ने भी अपने अभिनय से भूमिकाओं के साथ न्याय किया है। फातिमा बेगम (फारुख जाफर) ४-५ दृश्यों में ही अपने अभिनय से प्रभावित कर गयी हैं, उनकी भूमिका दर्शकों के लिए दूध में शक्कर डालने जैसा है।

फिल्म की कहानी १००-१२० साल पुरानी “फातिमा महल” नामक हवेली पर आधारित है। हवेली की मालकिन ९५ वर्षीय फातिमा बेगम के पति मिर्झा,स्वभाव से चिढ़नेवाले, स्वार्थी, लालची और हवेली पर कब्जा कर खुद के नाम पर उतारने के पीछे पागल है। मिर्झा हमेशा किरायेदारों के साथ किराया, साफसफाई और मरम्मत का खर्च, रहन-सहन, व्यवहार जैसे विभिन्न मुद्दों को लेकर लड़ता रहता हैं। सभी किरायेदारों ने हवेली पर कब्जा कर रखा हैं और उसके बदले में बहुत ही कम किराया देते हैं। उन सब में भी बांके सबसे कम किराया देता हैं और कई सालोसे उसने किराया बढ़ाया भी नहीं। पुरातत्व विभाग का अधिकारी ग्यानेश शुक्ला हवेली को हथियाने की कोशिश कर रहा हैं। इसलिए वो हवेली को ऐतिहासिक धरोहर घोषित कर उस पर सरकारी संपत्ति के रूप में अतिक्रमण करने के लिये, किरायेदारों को दूसरा घर देने का लालच देकर हवेली खाली करने के लिये उकसाता हैं । साथ ही हवेली बहुत पुरानी हैं, कभी भी गिर सकती हैं और हवेली में रहना जीवन के लिए खतरनाक है कहकर मिर्झा और बेगम को हवेली से निकालने के पीछे पड़ा हैं । क्रिस्टोफर क्लार्क हवेली मिर्झा के नाम उतारने में मदद करता हैं। 

संक्षिप्त में कहानी एक पुरानी हवेली “फातिमा महल” के इर्द-गिर्द घूमती है। हवेली के लिये मिर्झा-बांके-ग्यानेश कैसे चुहें-बिल्ली के तरह लड़ते है ये दिखाया गया है।

उत्कृष्ट और अभिजात अभिनेताओंने (अमिताभ, आयुष्मान, विजयराज) और उसी क्षमता के निर्देशक शूजीत सरकार ने फिल्म को मनोरंजन के शिखर पर पहुंचाने का निस्वार्थ प्रयास किया है लेकिन वह कहानी के रोड़े को पार नहीं कर पाए।

मिर्झा-बांके के बीच चल रहा चूहे-बिल्ली का खेल कैसे खत्म होता हैं, अंत में हवेली पर किसका राज चलता हैं, हवेली अंत में किसे प्राप्त होती हैं और फिल्म द्वारा दिया गया सामाजिक संदेश जानने के लिये,बिना किसी विशेष मनोरंजन और हंँसी की आस रखे, आप इस फिल्म को देख सकते हैं। बीच बीच में मनोरंजक या मजेदार  दृश्य आपको हंसाकर थोड़ी ताज़गी और उम्मीद देगी।

आप न देखने का फैसला भी अगर करते हैं,तो मनोरंजन के नजरसे आप कुछ खास नहीं खोएंगे और आपका समय बचेगा वो अलग।

Published by Chetan Nikam

Father of Cute, Sweet, Lovely Daughter who makes me to forgot all my worries, trouble and tension by single word "BABA". Engineer by profession

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