बरसात और मैं….भाग १ – बैर

बारिश. मुझे बारिश पसंद होने के कई कारण हैं, लेकिन बारिश ने जरुरत के समय कभी मेरा साथ नहीं दिया। यही एकमात्र मुख्य कारण है जिसकी वजहसे मुझे बारिश पसंद नही। यही वजह है की मेरी और बारिश की कभी नहीं बनी। ऐसा भी नहीं की मेरी बहुत बड़ी बड़ी उम्मीदे थी। लेकिन अगर कोई अच्छा काम करने का या किसीका भविष्य बनाने का ठान लेता है, तो वो मेरी क्यों सुनेगा?

मां, हमे सुबह ५.३० बजे जगाती थी। आँखें खोलते ही, पता चलता की यह सज्जन कल रात से ही जोर शोरसे बरस रहे हैं। यह देख, मेरे मन की नदीमे खुशी के बाढ आ जाती थी। “मुझे नहीं लगता आज दिनभर बारिश रुकेगी”, यह कहकर आज स्कुल से छुट्टी करने का सुझाव माँ को दूंगा, तभी माँ छाता निकालते हुए और अन्ना किताबे पॉलीथीन की बॅग में डालते हुई दिखाई देते। उन दोनों की यह जय्यत तैयारी देख मेरे खुशी की बाढ़ मे थोडा उतार आता।लेकिन “उम्मीद पे दुनिया टिकी है” सोचते हुए मन को धैर्य रखने के लिए कहता। भले ही माँ, अन्ना और छाता मुझे स्कुल भेजने का ठानकर विपक्ष में चले गए हों, लेकिन यह स्पष्ट था कि बारिश ने मेरे साथ मजबूत गठबंधन किया है। क्योंकि हम छात्र थे जिन्होंने “येरे येरे पावसा” गीत गाकर बारिश को आने के लिए मनाया था।

भले ही यह त्रिकुट, चादर में सोते रहकर बारिश के मजे लेने की मेरी योजना को विफल रहे थे। लेकिन दिल और दिमाग मे पक्का था की मेरी दोस्त आज स्कुल से छुट्टी जरूर करवायेगा। दुखी मन से ही मैं उठता था, बिस्तर से नीचे उतरकर प्रात:विधिया जल्दी जल्दी निपटा लेता था। मेरी दोस्त बारिश मजे से बाहर बरसते हुए मेरी उम्मीद जगाये हुये थी। मेरी दोस्त का मेरे प्रति लगाव देखकर मुझे जय-वीरू की दोस्ती याद आती थी। मेरे खुशी की बाढ़ मे फिर तेजी आ जाती। “स्कुल जाना ही नही तो तयार क्यू होना?” ये सवाल अपने मुंह से निकालने की कोशिश करता। लेकिन माँ-अन्ना की मुझे स्कुल भेजने कि भागदौड, उनके चेहरे या माँ के हाथों मे बेलन देख, वो सवाल बाहर आने की हिम्मत नही जोड पाता। स्कुल के कपड़े पहनकर,किताबें-नोटबुक बस्ते मे डालकर,सबकुछ ठीकठाक कर, तैयार होकर समय से ३० मिनिट पहले ही माँ के सामने चाय-ब्रेड के लिये हाजिर था। माँ ने चाय-ब्रेड से पहले हाथ में लंच बॉक्स थमा दिया था। लंच बॉक्स देखकर, मैं सोचने लगता था,माँ सुबह जल्दी उठकर हमारे लिए कितनी तकलीफ उठाती है। साथ ही ये भी ख्याल आता कि अगर आज लंचबॉक्स नहीं बनाया होता तो भी चलता, क्योंकि बहुत बारिश हो रही है स्कुल जाना मुश्किल है यह सोचकर मैं मन ही मन में “आनंदी-आनंदगडे इकडे तिकडे चोहीकडे (ख़ुशी ही ख़ुशी है इधर-उधर चारो तरफ)” ये कविता गुनगुनाने लगता। बाहर बारिश तेज हो गयी थी।अब यह स्पष्ट दिख रहा था कि अगले ३-४ घंटे ये महोदया छुट्टी लेनेवाली नही। यह देख, मेरे मन के ख़ुशी की बाढ़, मेरे नकारात्मक सोच को अपने साथ ले गई थी। फिर भी “स्कूल से आज दांडी” यह शब्द मेरे मुहंसे बाहर आने को तैयार नहीं थे। मैंने लंचबॉक्स को बस्ते में रख दिया। मेरी दोस्त बाहर संयम के साथ बरस रही थी और उसी संयम के साथ माँ अन्ना, मेरे छुट्टी के विचार की छुट्टी करने की तयारी कर रहे थे। आखिरकार माँ ने चाय को कप में डाला और चाय के साथ ब्रेड की प्लेट मेरे तरफ खिसकाकर, मेरी घरसे स्कूल जाने की आखिरी घंटी बजाई। इस महोदया का बाहर तांडव अभी भी चल रहा था, यह देख मेरा दिल भी नाच रहा था।

ऐसे बरसात में कोई नासमझ अरसिक ही गरम गरम चाय के लिये नहीं कहेगा। आगे का आगे देखेंगे यह मन को समझाकर ब्रेड को नकार देते हुए (स्कुल जाना ही नही, तो नाश्ता क्यु करना ! थोड़ी देर बाद माँ को मस्त गरम गरम पकोडे बनाने को कहुंगा। इन विचारों की नाव धीरे-धीरे मेरे मन की बाढ़ में झूल रही थी) मै चाय का कप अंतिम लक्ष्य तक पहुँचा रहा था। गरम गरम अमृततुल्य का आनंद लेते हुये, आज तो छुट्टी पक्की है इसी कपोलकल्पना में डुबा हुआ था। “बारिश बहुत है छाता होकर भी कपड़े गिले हो जायेंगे, गिले कपडो की वजहसे सर्दी खासी हो सकती है, चप्पल कीचड़ में फंसकर तुटने की संभावना ज्यादा हैं, बस्ते में पानी जाकर किताबें गिली होकर फट सकती हैं,स्कुल के सामने बहुत कीचड़ होता है उस वजहसे कपड़े खराब होते है” चाय खत्म होते ही इस तरह की बारिश विरोधी वित्तीय, मानसिक और शारीरिक क्षति की दलीलो की आधारपर, छुट्टी को एक कायदे से लियी गयी माता-पिता की मान्यता प्राप्त छुट्टी में परिवर्तित करने की सोच रहा था।

लेकिन वह पल आ ही गया जब बारिश और मेरी दोस्ती दुश्मनी में बदल गयी। रोज स्कुल जाने के समय के बराबर  ५ मिनट और मै चाय का कप खाली कर नीचे रखने से पहले, मुझे एहसास हुआ कि बारिश धीरे-धीरे आसमान में खोती जा रही है।मुझे कुछ समझने से पहले ही वो आसमान में कही गायब हो गयी और बादल भी छटकर आसमान एकदम साफ हो गया है। जैसे की ५-६ दिनोसे बारिश हुई ना हो और आगे भी नहीं होगी।

मुझे ये समझने में देर नहीं लगी कि मेरी दोस्त ने भी शोले की जय की तरह मेरा साथ बीच में ही छोड दिया है।जोश जोश में ब्रेड खाने से मना करने का बोझ दिल से ज्यादा पेटपर देकर, बस्ते का बोझ अपनी पीठ पर ढोकर और छाते को दुखी मन का सहारा बनाकर मै स्कुल की ओर कूच करता। घर के आंगन से आखरी बार भीख माँगते हुए नजरोसे आसमान की ओर देखते हुए, मैं भारी मन से स्कुल के लिये निकल जाता।१५ मिनट की पदयात्रा मुझे १५ साल की तरह लग रही थी। इन १५ मिनटों में जुदाई, याद,दिलबर को बुलाने जैसे न जाने कितने  गाने गाकर बारिश महोदया को आने की मिन्नते करते रहता। लेकिन वह जय इस वीरू की बात सुनने को तैयार ही नहीं था।

अंत में उपायो के सारे हथियार और छुट्टी की उम्मीद छोड प्रार्थना के समय से पहले मैं स्कुल पहुंचता। दुखी और नाराज मन से ही प्रार्थना की पंक्ती मे खडा होकर प्रार्थना कम और बारिश को कोसना ही सुरु रहता। साथ ही अब हम क्रिकेट खेलते वक्त आयी, तो याद रखना ऐसी धमकी भी दियी जाती। (पक्की सडक पे बनी हमारी क्रिकेट पिच और प्लास्टिक की गेंद गिली होकर खेल ना होने का कोई खतरा नहीं था। उपरसें पिच के आसपास जो पानी भरा होता उससे क्षेत्ररक्षको तैरने की सीख आसनी से मिलती थी)।

प्रार्थना खत्म होते होते आसमान मे काले बादल फिर से घिरने शुरु हो गये और मुझे छोटीसी ही लेकिन उम्मीद की किरण नज़र आने लगी। प्रार्थना खत्म भी हो गई, लेकिन वह अनुपस्थित की अनुपस्थित। पहली बार मैं एक अनुशासित बच्चे कि तरह बराबर पंक्ती मे और कछुवा भी मुझसे जीत जाये ऐसी गती से कक्षा के और जा रहा था।लेकिन बारिश महारानी बरसकर मुझपे कृपा करने को तयार ही नही थी। जिस गती से मैं कक्षा में जा रहा था, उसी गती से आसमान मे बादल छा रहे थे। कछुवा, मै और बादल जैसे हारने के लिये दौड रहे हो और बादल मुझे जिताने मे ही लगा था। शायद बादल बरसने के लिये मेरे कक्षा में पोहचने का ही इंतजार कर थे।

मैं कक्षा के दरवाजे तक पहुँचने से पहले मेरे सभी दांव आजमा चुका होता, हर कोशिश कर चुका होता और आखिरकार भगवान का नाम लेकर हथियार डाल देता।अब कुछ नही हो सकता खेल खत्म कहते हुए, बादलो की तरफ आँखे दिखाकर देख लुंगा, सबक जरूर सिखाऊंगा कहने के लिये बडी बडी आँखे कर जैसे ही चेहरा बाहर निकालता बारिश कि उतनी ही बडी बडी बुंदे, मै बादलो को देखने से पहले ही मुझे आँखें बंद करने के लिए मजबूर कर देती। तब तो मेरे गुस्से कि कोई सीमा ही नही रहती।

अब तो इसे आँखें दिखाकर घुस्सा करता ही हुं, कहकर जैसे ही मैंने चेहरा बाहर निकालकर देखा, तो बारिश महोदया मेरी ओर ही देखकर मुझे चिढा रही हो ऐसे लग रहा था। जैसे मुझे देखकर हंसते हुए कह रही हो “ले बेटा,मुझे जोर से बरसने कहकर खोटा सिक्का देता है (ये रे ये रे पावसा तुला देतो पैसा, पैसा झाला खोटा, पाऊस आला मोठ्ठा)। अब मैं पूरे दिन बरसुंगी, तु बैठ स्कुल मे पढते हुए और तेरा क्रिकेट खेलना भी गया पानी में”। तब मुझे ऐसा लगता था की मेरा और शोले के वीरू दोनो के साथ दगा या विश्वासघात नकली पैसे ने ही किया है।फर्क सिर्फ इतना था शोले में जय ने सिर्फ एक बार दगा किया था, लेकिन जब जब भी मैंने बारिश के वजहसे छुट्टी/दांडी के बारे में सोचा तब तब बारिश हमेशा ही मेरा विश्वासघात किया है।

रातभर-दिनभर जोर से बारिश, लेकिन जब स्कूल जाने का समय होगा,बराबर उसी समय यह महोदया चाय,नाश्ता,खानेका या फिर लघुशंका जाने के लिये विराम लेती। जैसे इसे हमारे स्कुल जाने का सटीक समय पता हो। बारिश के वजहसे स्कुल को छुट्टी ये मेरी एक कल्पना ही रह गयी। बचपन मे के हुए संस्कार और दिमाग में डाले गए विचार,आसानी से बदले नहीं जाते। विशेष:कर बारिश ने तुम्हारी छुट्टी की सोचपर, ऐन मौके पर विरोध कर पानी फेरा हो, तो बच्चे के दिमाग पर पडे प्रभाव को बदलना संभव ही नहीं है। इसलिए शुरूवाती कुछ अनुभव के बादही हमारी जय-वीरू की जोड़ी, ठाकुर-गब्बर की जोडी बन गई।और वो अभी भी वैसेही हैं (कौन ठाकुर और कौन गब्बर ये अलग चर्चा का विषय है)।

Published by Chetan Nikam

Father of Cute, Sweet, Lovely Daughter who makes me to forgot all my worries, trouble and tension by single word "BABA". Engineer by profession

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