
आज़ाद भारत में जन्मे हम, स्वतंत्रता के सभी बुनियादी मानव अधिकारों या उससे भी अधिक सुविधाओं के साथ इस देश में रह रहे हैं। लॉकडाउन लागू होने तक, “स्वतंत्रता या मुक्तता” शब्द या उसके मूल्य का जीवन में बहुत कम महत्व था (कहते है ना की जो चीज आदमी को आसानीसे और मुफ्त में मिलती है उसे उसकी कोई किम्मत नहीं होती)। लेकिन जब सरकार द्वारा तालाबंदी की घोषणा की गई या लगाई गई, तब वास्तव में स्वतंत्रता का सही अर्थ समझने में मदद मिली।
हमारे किसी भी बुनियादी मानवाधिकारों पर बंधन लाये बिना सरकार ने अचानक ही तालाबंदी घोषित कर दी या लगा दी। खुद की सुरक्षा और स्वस्थ जीवन के लिए,जब तक कि चीजें सामान्य नहीं हो जाती या प्रकोप कम नहीं हो जाता तब तक आपको बस घर के अंदर रहना था। घर के अंदर बंद रहकर गुजारे ३-४ माह (जेल या किसी बंधन में नहीं) गुलामी या कारावास में होने की भावना जागरूक कर रहे थे, हम निराशा के खाई में गिरते जा रहे थे, उदास थे, चिड़चिड़ापन स्वभाव छलक रहा था या हम मानसिक अस्थिरता के शिकार होते जा रहे थे, इसलिए हम स्थिर मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रेरक वक्ता, हास्य कलाकार, डॉक्टर और मनोचिकित्सकों से मार्गदर्शन ले रहे था या उनसे चर्चा कर रहे थे। और यह सब तब हुआ जब बहुत सारे लोग घर से ही काम कर रहे थे,मनोरंजन के लिए टीवी, इंटरनेट, मोबाइल, दूरदर्शन, यूट्यूब, नेटफ्लिक्स, अमेज़ॅन प्राइम जैसी चीजें उपलब्ध थीं और मुख्य बात सोशल मीडिया पर अपना ग़ुस्सा, विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता थी। इसका मतलब बस घर में रहने के एक प्रतिबंध के साथ हम स्वतंत्र और मुक्त थे, और मुख्य बात यह कि प्रतिबंध भी हमारी अपनी सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए था।
तालाबंदी के शुरुवाती कुछ दिन आसानी से गुजर गए लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए खरीदारी, होटल, मॉल, सिनेमा, पर्यटन नहीं जा सकते, इसलिए लोग निराश, उदास, तनावग्रस्त, दुखी और सरकार पर गुस्सा हो गए। लोगों को ऐसा लगने लगा कि वे गुलामी में हैं,बंधन में हैं, और लोगोने बंधन से मुक्ति या स्वतंत्रता के लिए चिल्लाना, रोना शुरू कर दिया।
तालाबंदी में थोड़ी छूट मिलनेपर, ४ महीने बाद जब हम कार में एक छोटी ड्राइव के लिए निकले, तब थोड़ा आगे जाने पर ऐसा लगा कि हम एक स्वतंत्र देश में सांस ले रहे हैं, हमें ऐसा लग रहा था कि हम फिर से आज़ाद हो गए, लग रहा था मानो हम बंधनमुक्त हो गए हो। उस समय की वह भावना या मानसिक स्थिति शब्दों में व्यक्त नहीं कियी जा सकती। उस समय केवल एकही विचार मन में आया कि यही वो भावना है जिसे स्वतंत्रता कहते है।
उस क्षण समझ में आया क्यों चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान जैसे कई वीरो ने बहुत कम उम्र में ही जिंदगी के उपर आजादी या हसते हसते मौत को गले लगाना चुना। कुछ स्वतंत्रता सेनानी केवल २३ वर्ष के थे और कुछ तो उससे भी छोटे। (आप-हम २३ साल की उम्र में क्या कर रहे थे या कर रहे है, यह सोचने की ज़रूरत नहीं है)। ५० साले से ज्यादा उम्र वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, क्यों नमक सत्याग्रह के लिए दांडी ३६० किलोमीटर पैदल चलते गये, क्यों उन्होंने देशव्यापी असहयोग आंदोलन का आह्वान किया, क्यों वे बार बार सत्याग्रह या अनशन करते थे, क्यों वह बिना किसी विचार के मुस्कुराते हुए बार बार जेल। ४० साले से ज्यादा उम्र वाले सुभाष चंद्र बोस, क्यों ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ सेना खड़ी करने के लिए कई परेशानी, कठनाईया और संकटो का सामना करते हुए जर्मनी और जापान गए। इनके अलावा लोकमान्य तिलक, विनायक सावरकर, लाला लाजपत राय, खुदीराम बोस, बटुकेश्वर दत्त, उधम सिंह, सरदार वल्लभ भाई पटेल, अनंत कान्हेरे, बलवंत फड़के, आलूर सीतारमा राजू, हेमू कलानी, मातंगिनी हाजरा, वंचिनाथन, कृष्णजी गोपाल कर्वे, बाघा जतिन, रोशन सिंह, प्रभावती देवी, प्रीतिलता वडेदार, जतीन्द्र नाथ दास, देवी दुर्गावती, भगवती चरण वोहरा, मदन लाल ढींगरा, कुशाल कोंवर, सूर्य सेन, अरुणा आसफ़ अली जैसे कई स्वतंत्रता सेनानियों की कभी न खत्म होने वाली सूची जिन्होंने आजादी के लिए हसते हसते अपना जीवन बलिदान कर दिया। क्योंकि यही वो वीर थे जो स्वतंत्रता का सही अर्थ या मूल्य जानते थे और साथ ये भी जानते थे कि आज़ादी आसानी से या थाली में सजाकर नहीं मिलेंगी। इसलिए गुलामी में रहने के बजाय, उन्होंने आजादी की लड़ाई लड़ते-लड़ते हसकर मौत को गले लगाने चुना। (कल्पना करें कि अगर सरकार ने तालाबंदी में बिजली सप्लाई बंद कर दी होती और आप टीवी, मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया आदि का उपयोग नहीं कर पाते, सवाल पूछने या विरोध करने का हक्क भी ना होता, बिना पूछताछ के गिरफ्तारी का नियम बना दिया होता, सामानों की कीमते असंबन्ध ही बहुत ज्यादा बढ़ाई होती या फिर भारी कर लगाया होता तो हमारा क्या हाल होता, उस समय हम क्या करते ? गुलामी मतलब सही में क्या है इसका एक छोटासा विचार।)
यदि हम ३-४ माह के बहुत ही थोड़े बंधनो वाले तालाबंदी से ही परेशान-निराश-उदास-दुखी हो गए,डरे गए, या मानसिक रूप से तनाव में आ गए, तो सोचिए अगर हमें २० साल (ब्रिटिश शासन के २०० साल के बारे में तो बात ना करना ही बेहतर) के लिए इस स्थिति या बंधन में ही रहना पड़ता,तो हमारा क्या हाल होता या फिर हमारे साथ क्या हुआ होता? इसीलिए यह स्वतंत्रता अनमोल है, और इसका सही उपयोग करना हमारी जिम्मेदारी है। इसलिए देश, स्वतंत्रता और सबसे महत्वपूर्ण जिन लोगों ने स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन दिया उनके पथ और सिद्धांतों के बारे में सोचे बिना, उनका आभार मानना और उन्हें सम्मान देना जरुरी है और हमारा कर्तव्य भी है।
हम निश्चित रूप से स्वतंत्रता सेनानियों के खून से लाल रंग में रंगे इस दिन का आनंद ले सकते हैं क्योंकि यह भी स्वतंत्र देश में स्वतंत्र नागरिक का मौलिक अधिकार है। आप पूरा दिन गाने सुनकर, फिल्मे देखकर, अलग-अलग जगहों पर जाकर या आप का दिल करे वैसे छुट्टी का आनंद उठा सकते है। लेकिन एक जागरूक,बुद्धिमान और जिम्मेदार नागरिक होने नाते हम अपनी छुट्टी में से कम से कम १५ मिनट देश और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए कुछ रचनात्मक, सकारात्मक काम करने को समर्पित करने की कोशिश करही सकते हैं। विशेषत: उन लोगों के लिए जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपनी जान गंवाई ताकि हम स्वतंत्र भारत में स्वतंत्र नागरिक के रूप में सांस ले सकें और १५ अगस्त स्वतंत्रता दिन को गर्वसे मना सकें।