धोनी………..अनमोल पलो का शायर (हिंदी)

१९९६, ११ साल की उम्र में, मुझे भारतीय क्रिकेट टीम की नीली जर्सी से प्यार हो गया।यह वह समय था जब मैं क्रिकेट और विशेष रूप से भारतीय क्रिकेट टीम का चाहता बन गया। मेरे जीवन की सबसे पहली बड़ी स्पर्धा और पहला बड़ा मैच जो मैंने टीवी पर देखी वो थी विल्स विश्व कप १९९६ में पाकिस्तान के खिलाफ का मैच, जिसमें प्रसाद ने सोहेल की डंडीया उखाड़कर उसके “कह के लूंगा” की धज्जिया उड़ा दियी थी , उस वक़्त मेरा प्यार दोगुना हो गया था। क्रिकेट के प्रति मेरे प्यार की असली वजह मेरे बड़े मौसेरे भाई थे। मेरे भाइयोंने ने मुझे क्रिकेट के बहुत सारे नियम सिखाए, लेकिन भारतीय क्रिकेट का पहला नियम जो मैंने आत्मनिरीक्षण से सीखा, वह था मास्टर ब्लास्टर के बाद होते ही बिना कोई सकारात्मक विचार या अपेक्षा रखे टीवी बंद करना। यदि आप ज्यादा बैचैन हो, तो केवल १% जीत की उम्मीद के साथ मैच का परिणाम पूछ सकते हैं।

यह वो समय था जब भारतीय प्रशंसकों को ९८% विश्वास था कि भारत जिम्बाब्वे, बांग्लादेश, यूएई, केन्या और अन्य कसोटी दर्जा नहीं उन संघो के खिलाफकी मैच में जीत पक्की है। पाकिस्तान के खिलाफ जब मैच होता था तब ४०% जीत का विश्वास, ११०% उम्मीद और १५०% देशभक्ति रहती थी। न्यूजीलैंड, श्रीलंका, इंग्लैंड, वेस्टइंडीज के खिलाफ मैच में ५०% जीत का विश्वास रहता था।वही आत्मविश्वास दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मैच में २५-३०% और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मैच में केवल २-३%, २००% ईर्ष्या और पंचो, ऑस्ट्रेलियाई खिलाडीयो को अनगिनत गाली देना का समय रहता था।

उस समय भारतीय क्रिकेट प्रशंसक ऑस्ट्रेलियाई टीम और खिलाड़ियों से क्रोध और ईर्ष्या करते थे। मैं ऑस्ट्रेलिया को हारते हुआ देखना चाहता था और इस खुशी को अपने आँखों से देखने के लिए, मैं किसी भी टीम के खिलाफ उनका मैच हो, देखता जरूर था। और उन मैचों में,ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज बाद होने का और प्रतिद्वंद्वी द्वारा मारे जाने वाले चौके-छक्कों का जश्न ऐसे मनाता था, मानो मैं उस टीम का प्रशिक्षक हु या मैंने उस टीम पर करोड़ों रुपये का सट्टा लगाया हो।लेकिन ऑस्ट्रेलियाई टीम इतनी संतुलित थी कि उनकी हार को देखना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था।

ऑस्ट्रेलिया की तेज,जबरदस्त और आक्रमक गेंदबाजी का तो कोई तोड़ ही नहीं था, उस तुलनामें भारतीय टीम की गेंदबाजी की ताकत का जिक्र नहीं करना ही ठीक। लेकिन एक खास बात जब भी ऑस्ट्रेलिया हार के कगार पर होता, तो उस हार को जीत में बदलने वाला एक प्रमुख खिलाड़ि था माइकल बेवन, जो उस समय का सर्वश्रेष्ठ फिनिशर था, जबकि भारतीय टीम में ये जिम्मेदारी अजय जडेजा के कंधो पर थी। लेकिन २२ गज की पिच पर, अजय जडेजा फ़िनिशर से बेहतर एक धडाकेबाज बल्लेबाज की भूमिका ही अच्छी निभाते थे। वे उस वक़्त के माइकल बेवन के बल्लेबाजी औसत ५४ के कभी करीब भी नहीं थे।मुझे याद है, जब भी बल्लेबाजी की वजह से ऑस्ट्रेलियाई टीम मुश्किल में आती थी, उन्हें बचाने के लिए बेवन हमेशा ही हाजिर रहते थे, वह नीचे के गेंदबाजों को साथ लेकर और सिर्फ एक-दो रन बना बनाकर मैच जीत लेते थे।इसलिए मैं हमेशा सोचता था कि माइकल बेवनने भारतीय नागरिकता ले लेनी चाहिए या फिर वह किसी दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो जाने चाहिए (हाँ, विनाशकारी ही सही, लेकिन यह मेरे उस वक़्त के विचार थे क्योंकि भारतीय टीम की जीत से ज्यादा कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं था) या शांततपूर्ण मार्ग उन्हें जल्द से जल्द क्रिकेट से संन्यास ले लेना चाहिए।

लेकिन भगवान,समय और भाग्य हमेशा ऑस्ट्रेलिया के साथ ही थे। मुझे विश्वास हो रहा था कि किसीको भी बेवन को रोकने में दिलचस्पी नहीं है  और मैं भी व्यक्तिगत रूप से बेवन की काट नहीं ढूंढ पा रहा था। ये कम था की बेवन के कंधे से कंधा मिलाकर ऑस्ट्रेलिया को और ज्यादा ताकदवर और जीत का दावेदार बनाने के लिए यष्टिरक्षक-बल्लेबाज एडम गिलक्रिस्टने ने ऑस्ट्रेलिया टीम में जगह बनाई और बेवन के साथ साथ वो भी ऑस्ट्रेलियाई टीम के जीत के सूत्रधार बन गए। और हमारे पास थे नयन मोंगिया, एक विशेषज्ञ यष्टिरक्षक और बल्लेबाजी में वह पिच पर आकर गार्ड मार्क करते ही भारतीय टीम के निचले बल्लेबाजों के शुरुवात होती थी। एकदिवसीय मैचों में ८० से अधिक की स्ट्राइक रेट से उनके द्वारा बनाए गए २० से अधिक रन, यष्टिरक्षक-बल्लेबाज द्वारा बनाया गया एक नया भारतीय रिकॉर्ड होता था। भारतीय क्रिकेट में उनका सबसे बड़ा योगदान रहा, १९९८ में शारजाह में मास्टर ब्लास्टर द्वारा खेली गयी दो शतकीय तूफानी पारी में से एक में उनका नॉन स्ट्राइकर बनकर साथ देना और कसोटीमें सलामी बल्लेबाज के रूप में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ बनाये १५२ रन। लेकिन वह मैच फिक्सिंग में पकड़े गए और टीम से बाहर हो गए, तब से भारतीय टीम अच्छा प्रदर्शन कर टीम में अपनी जगह पक्की बनाने वाले एक अच्छे यष्टिरक्षक की तलाश में थी ,जो अगर समय आया तो, एक बल्लेबाज के रूप में गेंद को कैसे रोका जाए ये जानता हो (चूंकि यष्टिरक्षक-बल्लेबाज़ मिलना भारतीय टीम की नियति में ही नहीं था, इसलिए टीम और प्रशसंक एक अच्छा विशेषज्ञ यष्टिरक्षक मिलने पर भी साथ खुश हो जाते)। १९९९-२००४ में भारतीय टीम ने इतने यष्टिरक्षकोका प्रयोग किया की प्रायोजक टी-शर्ट पर नाम या नंबर के बदले “यष्टिरक्षक” ही मुद्रित करवाते थे, ताकि अंतिम समय पर कोई भी उसका उपयोग कर सके। सभी भारतीय यष्टिरक्षक गल्ली क्रिकेट का “सबको बल्लेबाजी मिलनी चाहिए” नियम का सख्ती से पालन कर रहे थे, इसलिए वे पिच पर बहुत अधिक समय बिताना पसंद नहीं करते, जैसे ही वे बल्ला लेकर पिच पर जाते,थोड़ी ही देर में गेंद रंग देखकर और खिलाड़ियों का हाल पूछकर वापस आ जाते। लेकिन मैं भाग्यशाली था, क्योंकि समीर दीघे ने २००१ में वेस्टइंडीज के खिलाफ स्पर्धा के अंतिम एकदिवसीय मैच में बनाये ९४ रन और २००२ में अजय रात्रा ने वेस्टइंडीज के खिलाफ ही कसोटी मैच में बनाये ११२ रन जो कसोटी क्रिकेट में विदेशी धरती पर भारतीय यष्टिरक्षक ने बनाया पहला शतक था, इन दोनों परियो को मैंने अपने आँखोंसे देखा। इन दोनों पारियो को देख मैं और भारतीय प्रशंसक इतने खुश हो गए की आसमान भी छोटा पड़ने लगा और लगने लगा की अब जीवन में देखने के लिए कुछ नहीं बचा है। (क्षमा, यदि मैं उस समय किसीभी भारतीय यष्टिरक्षक द्वारा खेली गयी कोई महत्वपूर्ण पारी भूला हु तो)। पार्थिव पटेल, १६ वर्षीय लड़का इस सबमे थोड़ा अपवाद था। वह यष्टिरक्षन के साथ साथ बल्लेबाजी भी अच्छी करता था। हालाँकि, भारतीय टीम “द वाल” के सामने ही आकर थम गयी और आखिरकार द वॉल ने गेंद को विकेट के दोनों ओर रोकने की जिम्मेदारी अपने कंधे पर ले ली । ऑस्ट्रेलिया के लिए, गिल्ली सलामी बल्लेबाज के रूप में गेंदबाजों का करियर खराब कर रहा था, जबकि विकेट के पीछे उसकी चपलता और प्रदर्शन के आस पास भी कोई नहीं था (संगकारा एक विशेषज्ञ बल्लेबाज बन गए थे और बाउचर बल्लेबाजी में इतने भी विश्वसनीय नहीं थे)। गिली उस समय विश्व क्रिकेट में सर्वश्रेष्ठ यष्टिरक्षक-बल्लेबाज थे। इसलिए मै बेवन के बारे में जो भी अच्छा या बुरा सोचता था, अब गिली का भी नाम उनके साथ जुड़ गया था।
कप्तानी हमेशा ही ऑस्ट्रेलिया का सबसे मजबूत पक्ष या ताकत रही है, टेलर-वॉ-पोंटिंग-क्लार्क-स्मिथ ने ऑस्ट्रेलिया के एक के बाद एक श्रृंखला जीतने के रथ को दौड़ते रखा, और क्यों नहीं रखे? जब आपकी टीम में यष्टिरक्षक-बल्लेबाज गिली और मैच जीतकर ही पिच से हटने वाला बेवन हो तो आपकी टीम के लिए जीत सिर्फ समय की बात है।
मैं हमेशासे मानना थी की भारतीय टीम में गिली जैसा यष्टिरक्षक-बल्लेबाज, बेवन जैसा मैच ख़त्म करके ही रुकने वाला बल्लेबाज और स्टीव वॉ जैसा कप्तान होना जरुरी है। ये तीन खिलाड़ि ही भारतीय क्रिकेट टीम और प्रशंसकको जीत की आदत लगा सकते है। भारतीय क्रिकेट टीम के चयनकर्ता भी ऐसेही खास और महत्वपूर्ण ३ खिलाड़ि एक अच्छा मैच जीत में ख़त्म करनेवाला, एक अच्छा यष्टिरक्षक-बल्लेबाज और एक अच्छे कप्तान की तलाश में थे। १९९९ में कप्तान के रूप में दादा और चौथे नंबर पर बल्लेबाजी के लिए आने वाले युवराज ने भारतीय प्रशंसकों की आदतों को थोड़ा बदल दिया था और उम्मीद बढ़ा दिए थी। लेकिन टीम अभी भी मैच को अंत तक ले जाने वाले बल्लेबाज और अच्छे यष्टिरक्षक की प्रतीक्षा कर रही थी, लेकिन प्रशंसक अभीभी “ये दिल मांगे मोर” का ही गाना गा रहे थे।  

“आंधळा मागतो एक डोळा देव देतो दोन डोळे” (अंधा एक आँख मांगता है और भगवान दो देता है) मानो यही साबित करने के लिए धोनी ने बांग्लादेश के खिलाफ भारतीय टीम में पदार्पन किया। धोनी और विकेटकीपर-बल्लेबाज की प्रतीक्षा कर रहे भारतीय प्रशंसकों के लिए यह पदार्पन दिल तोड़ने वाला ही थी। धोनी ने पहले तीन मैचों में केवल १९ रन बनाए और मुझे पार्थिव पटेल की टीम में वापसी के सपने आने लगे।लेकिन भारतीय क्रिकेट के अंधेरे भविष्य में, धोनी नामका सूरज तेज उजाला लाने वाला था। और फिर आयी पाकिस्तान के खिलाफ का वो मैच आया जब धोनीने १२३ गेंदों पर १४८ रन बनाकर, पाकिस्तानी गेंदबाज और क्षेत्ररक्षकको परेशान कर के रख दिया।इसके बावजूद विशेषज्ञों ने पाया कि धोनी की बल्लेबाजी और यष्टिरक्षण इतना तकनिकी नहीं है और उसमे खामियां है। लेकिन जब तक खिलाड़ी टीम के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता हैं और टीम जीतती है, तब तक भारतीय प्रशंसक और मैं खिलाडी के तकनीक की बिलकुलही परवाह नहीं करते। (मांजरेकर, कांबली जैसे तकनिकी और प्रशिक्षित खिलाड़ियों का टीमके जीत में योगदान हमेशा चर्चा का विषय रहा है)। धोनी ने अपनी बल्लेबाजी और यष्टिरक्षण के दम पर टीम में पहले स्थान हासिल कर पक्का किया, फिर धीरे-धीरे मैच-विजेता और मैच-ख़त्म करने जैसी विभिन्न भूमिकाओं के अनुरूप अपनी बल्लेबाजी शैली को बदल दिया। और जब उन्होंने कप्तानी संभाली, तबी से तो भारतीय क्रिकेट का चेहराही बदलने लगा।
“नसीब हमेशा वीरो का साथ देता है” लेकिन कुछ ही वर्षों में एक बहादुर, निडर, शांतचित्त और विचारवान वीर ने भारतीय क्रिकेट की किस्मत और नसीब को ही बदल दीया। उन्होंने यह सब किया अपनी मैच अंत तक ले जाकर ख़त्म करने की, विकेट में तेजी से दौड़ने की, विकेट के पीछे तेजी से और सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के की, टीम के लिए किसी भी क्रम में बल्लेबाजी करने के लिए तैयार रहने की, परिस्थिति और जरूरत के हिसाब से बल्लेबाजी की शैली में बदलाव करनेकी, सबसे खास टीम को मजबूत और  एकजुट रखनेकी, उत्साहित करने की, भावनाओं में बहकर न जाते हुए स्थिर और शांत मन से नेतृत्व करने की और विरोधियों को हमेशा चौंकाने वाले आश्चर्य में डालकर जाल में फ़साने की अपनी महान क्षमतोसे।
“आखिरी गेंद फेंके जाने तक मैच सुरु ही रहता है” वास्तव में इसपर विश्वास रखनेवाला और निष्पादित करने वाला खिलाड़ी, मास्टर ब्लास्टर विकेट जल्दी गिराने के बाद भी हम जीत सकते हैं,इस उम्मीद में प्रशंसकों मैच देखने पर मजबूर करनेवाला खिलाडी, छक्के के साथ मैच ख़त्म करना जिसे पसंद और शौक था ऐसा खिलाड़ी,जो किसीभी और किसकीभी गेंद पर अपनी ताकत से आसानी से छक्का लगाता था ऐसा खिलाडी, क्रिकेट और मैच की स्थिति को अच्छी तरह पढ़ना जिसे बखूबी आता था ऐसा खिलाडी, २०११ विश्व कप अंतिम मैच में लय में चल रहे युवराज की जगह पांचवें स्थान पर बल्लेबाजी करने का आत्मविश्वास दिखाकर इतिहास बनानेवाला खिलाडी। २००७ के २०-२० विश्व कप फाइनल में भज्जी द्वारा अंतिम ओवर में गेंदबाजी करने से इनकार शांत दिमाग और मन से जोगिंदर से अंतिम ओवर करवाकर विश्व कप जीतने वाले युवा, अनुभवहीन और निर्विवाद कप्तान ऐसा खिलाडी । विरोधी टीम के विचारों और खेल को पढ़ने की क्षमता रखनेवला और उसी के अनुसार त्वरित योजना बनानेवाला कप्तान और खिलाडी। नए खिलाड़ियों को मौका देनेवाला, युवा खिलाड़ी और खिलाड़ियों की क्षमता पर विश्वास करनेवाला, खिलाड़ियों को उत्साहित कर उनका हौसला और विश्वास बढ़ानेवाला, खिलाड़ियों को अपना खेल दिखने का पर्याप्त अवसर देनेवाला कप्तान।दुनिया के सबसे तेज यष्टिरक्षक, उनके करियर में कुल १९५ यष्टिचित विकेट, जो दूसरे स्थान पर (१३९) यष्टिरक्षक से ४०% अधिक है, इससे साबित होता है कि विकेट के पीछे वह कितने तेज थे।

कौन उसे पसंद या नापसंद करता है, टीम के अन्य खिलाड़ियों के प्रति उसका क्या नजरिया है, वह उनके साथ कैसा व्यवहार करता है, उसने पुराने खिलाड़ियों के साथ क्या किया, एक व्यक्ति के रूप में वह कैसा है, उसने कब संन्यास लेना चाहिए था, आदि सभी बातों से भारतीय प्रशंसकों को कोई फर्क नहीं पड़ता है। क्योंकि प्रशंसकको के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत ने आईसीसी विश्व कप २०११ जीता, २००७ आईसीसी २०-२० विश्व कप जीता, भारतीय टीम ने पहली बार आईसीसी टेस्ट रैंकिंग में शीर्ष स्थान हासिल किया, आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी में जीत हासिल कियी, ऑस्ट्रेलिया में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ ३ में से बेहतर शैली के अंतिम मैचोवाली कॉमनवेल्थ बैंक कप जीता और ये सब मुकाम भारतीय टीम ने हासिल किया दुनिया के सबसे अच्छे मैच जीत में खत्म करने की क्षमतावाले यष्टिरक्षक-बल्लेबाज कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के नेतृत्व में। जिसने भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों को जीतने की आदत लगायी और भारतभी ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मैच जीत सकता है यह आत्मविश्वास ३% से बढाकर ८०% किया।
अपने खास अंदाज में मैच का ख़त्म करने वाले धोनी ने अंतरराष्ट्रीय करियर से चुपचाप संन्यास ले लिया।
किसी भी बुरी घटना के बारे में हमेशा कुछ न कुछ सकारात्मक होता ही है। धोनी के संन्यास के बारे में सकारात्मक बात यह है कि प्रशिक्षक के रूप में रवि शास्त्री की जगह लेने के लिए बीसीसीआई के पास अब दो सबसे अच्छे विकल्प हैं। पहले बेशक और निर्विवाद “द वॉल” है, जिस तरह से उन्होंने युवा क्रिकेट टीम के खेल और रंग को बदल दिया है इसके बाद उन्हें किसीभी अन्य तरीके से अपनी क्षमता साबित करने की आवश्यकता नहीं है। और अन्य व्यक्ति, जो जानता है कि थोड़े उम्रदराज, थके हुए, खोए हुए और गैर निष्पादित खिलाड़ियों के साथ भी मैच कैसे जीता जाता है ऐसे एमएस धोनी। आईपीएल में चेन्नई के लिए वह हमेशा उम्रदराज, अन्य टीमों द्वारा अनुबंध से निकाले गए  और अच्छा प्रदर्शन न करने वाले अच्छे खिलाड़ियों को ही खरीदते है (वॉटसन, बद्रीनाथ, मैकुलम, मॉरिस, पीयूष चावला, मोहित शर्मा, बालाजी, रायुडू, जाधव, ताहिर, भज्जी, ड्वेन स्मिथ, हेडन, एल्बी मोर्कल इसके कुछ उदाहरण हैं)। लेकिन जैसे ही वह सीएसके की पीली टी-शर्ट पहनकर धोनी नेतृत्व कर रहे चेन्नई के टीम में सवार हो जाते है, वैसे ही उन्हें कौन सी ऊर्जा और लय मिलती है ईश्वरही जानता है, क्योंकि तब वह इतना असाधारण, अविश्वसनीय प्रदर्शन करते है कि वह उनके करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन बन जाता है। तो चलिए “उम्मीद पे दुनिया कायम है” कहते हुए आशा करते हैं और उम्मीद रखते हैं कि हम जल्द ही धोनी को एक नई भूमिका में देखेंगे और तब तक, आईपीएल जिंदाबाद कहकर उनके खेल का आनंद लेते रहेंगे।

कर्णधार, खिलाड़ी और उसके खेल के लिए कुछ पंक्तियाँ, अंतिम लेकिन आखरी नहींपल दो पल के शायरकी, क्या खूब थी वो शायरी जो अमर हुयी, पल दो पल ही तेरी कहानी थी,लेकिन याद है जीती वो जंगे जो तूने है खूब लड़ी,
पल दो पल ही तेरी हस्ती थी, जो हर पल लोगो के दिल में है बसती,
पल दो पल ही तेरी जवानी थी,वो जवानी ही अब जवानो को दीवाना है करती………..

पल दो पल की ये अनमोल कहानी, जिसका नाम महेंद्रसिंह धोनी।  

Published by Chetan Nikam

Father of Cute, Sweet, Lovely Daughter who makes me to forgot all my worries, trouble and tension by single word "BABA". Engineer by profession

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