Raktanchal – Hindi Webseries – Review

Raktanchal

Raktanchal, one more true events-based web series, streaming on MX player since May 2020. Series with 9 episodes of an average length of 25-30 minutes with the story of Crime-Killing-Gangwar-Political-Violence-Thriller-Drama.

The lead role played by Vijay Singh (Kranti Prakash Jha), clever, a bright student, an IAS aspirant. His father gets murdered in front of him, to take revenge he turns to be a shark of the criminal world. In a very short time with power, strength, the expertise of misguiding, sharp, and clever minds he becomes a famous name in the criminal and illegal world and dominates it. But he keeps helping poor and needy people. Waseem Khan (Nikitin Dheer) is a criminal hulk of the Purvanchal with dominance in all criminal and illegal activities with local MLA Pujari’s support. With Wasim’s muscle power and money, MLA Pujari gets all the major government contracts of construction, railway, coal, etc.
Supporting role by Seema (Ronjini Chakraborty) Dancer turned Vijay’s gang member, Katta’s girlfriend, who honeytrap Sanki. Bechan (Chittaranjan Tripathy) Vijay’s uncle and guide. Tripurari (Pramod Pathak) is a man who saves Vijay from Wasim’s man in jail and arranges his bail with the help of Sahib Singh and becomes the trusted and close aid of Vijay. Sanki Pandey (Vikram Kochhar) Coal agent and Wasim’s right hand. Katta  (Krishna Bisht) is Vijay’s shooter. Chhunnu (Basu Soni) Bechansingh’s son and Vijay’s trusted man, who witnesses Tripurari’s killings. Sadhu Maharaj (Rajesh Dubeay) is a spiritual guru and political player who supports Sahib Singh. Roli (Soundarya Sharma) Vijay’s love interest. Badki (Prachi Prakash Kurne) Vijay’s sister. Fazila (Farah Malik). Bindu (Kenisha Awasthi) actress, who campaigns for Sahib Singh. Bilal (Shashi Chaturvedi) Waseem’s trusted man and right hand after Irshad’s death. Sudha (Pravina Bhagwat Deshpande) Vijay’s Mother. Pujari Singh (Ravi Khanvilkar) MLA of the city from 3-4 terms, who support Wasim and runs criminal, illegal activities in the city, who plan Vijay’s encounter. Sahib Singh (Daya Shankar Pandey) Political leader, MLA, contractor, Pujari’s rival, Vijay’s close aid, Vijay helps Sahib to win Banaras MLA seat against Pujari. Irshad (Bhupesh Singh) Waseem’s right-hand and trusted man, who takes care of his contract allotment and related activities, other illegal businesses, is the first man who sees Vijay’s face and attacks Vijay’s family. Hifazat (Sushil Kr. Srivastav) is Waseem’s man who takes care of his illegal arms business. Virendra Singh (Gyan Prakash) Vijay’s father, a man of principles who fights for villagers.

The story is based on Varanasi, a city from Purvanchal in the decade 1980-90. It is about the rivalry between two gangs, Vijay Singh and Wasim.

Vijay’s father, a socially active man of principles. Murdered by Wasim’s man when he tried to fight for villagers, against illegal mining and labor. Vijay and Bechan kill Wasim’s man to take revenge. They get arrested and sent to jail. Tripurari with the help of Sahib Singh takes Vijay out from jail.
After getting free, Vijay in disguise starts building his own criminal empire and fighting against Wasim. While getting a government contract Vijay attacks Irshad. To take revenge Irshad attacks Vijay’s house during her sister’s “Gauna” and injures his mother and brother-in-law. In vengeance Vijay kills Hifazat.
Vijay makes sure Sahib Singh wins the MLA election defeating Pujari and ultimately Wasim. Wasim plans riots and kills Sahib Singh, in this attack Tripurari loses his hand. Angry Vijay kills Irshad. After Irshad gets killed, Sanki becomes trusted and close aid of Wasim and attacks Vijay. Seema and Katta save Vijay’s life and join Vijay’s gang.
After Sahib Singh’s murder, Waseem makes Pujari MLA again, and to reduce Vijay’s strength Wasim kills Tripurari.
Vijay with the help of Seema, honey traps Sanki but fails to kill him in a 2-3 attempt.

Finally, Vijay plan and kills Pujari. Baba, an unknown character gives Vijay an illegal contract to vacate land from the farmer. But Vijay changes his mind when knows about his daughter’s marriage and leaves. Waseem’s men attack the farmer’s home and kill the entire family with Vijay’s name. After this mass murder, Vijay has declared a Public enemy and given a shoot at sight order.

Wasim calls Vijay alone for a face-to-face meeting. And in a shoot-out between these two gangs, Wasim and Vijay get heavily injured. Injured Vijay fell into the river and flows away, his family mourns for his death. Sanki misses to kill Vijay and the gang and returns to talk with the injured Wasim. The Series ends with one big twist. So you can wait for the second season.

Based on true events and full of violence, the title “Raktanchal” perfectly suits it. Some scenes or events really raise questions on the system. Everybody acted well in the series. If you are a fan of “Gangs of Wasseypur”, it is a must-watch series with equally good acting and violence. Else skip it and keep your mind fresh, calm, cool, and positive without scolding gang war, crime world.

बेटी…….अष्टलक्ष्मी

आर्ना…खुशियों की पोटली

Little Hands of our Ashtalakshmi Aarna

महाराष्ट्र में जब भी किसीके घर बेटी का जन्म होता है, तो “अभिनंदन लक्ष्मी आली किंवा धनाची पेटी आली” (बधाई हो आपके घर लक्ष्मी आयी है या धन की पेटी आयी है) कहकर लोग बधाई देते है। तुम्हारा जन्म होने से पहले तक मैं सोचता था, किसी पिता को उसकी बेटी के जन्म के बाद हुए अचानक धनलाभ की वजहसे विकसित और लोकप्रिय हुआ एक सरल वाक्यांश है।

लेकिन तुम्हारे जन्म के बाद, जब पहली बार मैंने तुम्हे अपने हाथो में लिया तब तुम्हारे छोटे-छोटे हाथ-उंगलिया, छोटी-छोटी काली आंखें और मेरी हथेली से भी छोटा सिर देखकर आंखों से निकले खुशी के आंसुओकी एक-एक बूंद बहुत अनमोल है और उस पल की यादें इतनी कीमती हैं कि उन मीठी यादों की जगह कोई नहीं ले सकता। उसी वक़्त मुझे एहसास हुआ की “संतान लक्ष्मी” के आशीर्वाद से “आदि लक्ष्मी” ही मेरे घर पधारी है।

खाने के प्रति तुम्हारा खास लगाव है, उसमेभी विशेष रूपसे खाने का स्वाद, रंग, विविधता और प्रस्तुति के प्रति तुम बहुत सतर्क हो और इसका खास ख़याल रखती हो। इसी वजहसे हम हमेशा तुम्हारे लिए सुंदर, स्वादिष्ट और स्वस्थ भोजन बनाने के सोच में ही रहते हैं ताकि तुम हसते हसते, एक ही जगह बैठकर जल्द से जल्द अपना खाना समाप्त कर लो। तुम्हारे खाने के व्यजनोंपर चर्चा, अनुसंधान और प्रयास करने के बाद, जब तुम थाली में परोसा पूरा भोजन समाप्त कर मुस्कुराती हो ,तब हमें भी संतुष्टि का आभास होता हैं (तुम्हारा पेट, उम्र, या तुमने पहले क्या, कब और कितना खाया था इसको नजरअंदाज कर, जितना हम उचित समझते हैं उतना थाली में परोसते है और अपेक्षा करते हैं की तुम वो सब ख़त्म करो)। जिस क्षण तुम थाली में परोसा गया पूरा खाना खत्म करती हो, उस वक़्त हमें आसमान भी छोटा लगने लगता है और हम विजयीवीर जैसा महसूस करते हैं। उस वक़्त हमें लगता है की “धान्य लक्ष्मी” ही हम पर कृपा बरसा रही है।

तुम्हारे पीछे दौड़ते दौड़ते या तुम्हारे साहसी काम, खेलक़ुद या अजीब अजीब हरकतोंसे तुम्हे बचाते बचाते हम भी पूरी तरह थक जाते हैं, लेकिन तुम अपनी मुस्कान, नृत्य, शरारत, प्यार और अलग अलग “नौटंकी” भरे कामोसे से हमें ऊर्जा और उत्साह पुनः प्राप्त करने में मदद कर दुगनी तेजी से काम करने की शक्ति प्रदान करती हो। तुम्हे मुस्कुराते हुए देखते हैं ही हम अपनी सारी थकान-दर्द भूल तुरंत तरोताजा हो जाते हैं, मानो “धैर्य लक्ष्मी” ने ही हमें तनाव, दर्द और थकान सहन करने की शक्ति, ऊर्जा और धैर्य का आशीर्वाद दिया हो। झूला, पलंग, कुर्सी, डाइनिंग टेबल, सोफा, सीढ़ियाँ, टॉय कार, कार घूमते आदि वक़्त तुम्हारे खुदके आयु से बड़े बड़े साहसी कार्य हमें यह एहसास करवाते हैं कि “वीर लक्ष्मी” हमारे साथ रह रही हैं।

तुम्हारे माता-पिता दोनों ही पशु प्रेमी नहीं हैं और पशुओसे दूर रहने की ही कोशिश करते हैं। फिरभी न जाने कहासे तुम्हारे मन में पशुओ के प्रति प्यार और लगाव आया है,उसमे भी कुत्ते और हाथीयो के प्रति तुम्हारे मन में विशेष लगाव हैं। जब भी तुम्हे टीवी, लैपटॉप, मोबाइल, टॉय शॉप या किसीभी अन्य जगह पर पशुओ को देखने का मौका मिलता है, तब तुम्हारा आनंद और उत्साह चरमसीमा पर हैं ये तुम्हारे आवाज से त्वरित पता चल जाता हैं। पशु चित्र में है, खिलौना है, टीवी में या असली है इस बात का तुम्हे कोई फर्क नहीं पड़ता तुम्हे उतनी ही ख़ुशी होती है। पशुओ के प्रति तुम्हारा यह लगाव और प्यार देखकर, तुम्हारे रूपमे “गज लक्ष्मी” हमारे आँगन में खेल रही है इस बात की हमें खुशी मिलती हैं।

छोटी चंचल बच्ची तुम, खुद के ही “देर से सोना, देर से उठने” के नियम से जीती हो। तुम्हे जल्दी सुलाने के लिए हम युद्धस्तर का हर संभव प्रयास करते हैं। ताकि एक बार तुम अपने सपनों की रंगीन दुनिया की यात्रा सुरक्षित रूप से शुरू करो, तो हम भी आराम कर अगले दिन के कामों के लिए तरोताजा हो सके। लोरी, गीत, भजन, नृत्य, पढाई आदि अलग अलग तरीकोंसे हम तुम्हे सुलाने की कोशिश करते हैं। लेकिन तुम्हे हमारे प्रयासों पर पानी फेरने के लिए हर रात दोहरी ऊर्जा कहां से लाती हो यह भगवान ही जाने। हम तुम्हे सुलाने की हर नाकाम कोशिश करते रहते हैं और अंत में हार एव थककर मानसिक रूप से सोते हुए किसी तरह हम अपनी आँखे खुली रखकर तुम पर नज़र रखते हैं। शायद तुम हमें ऐसे द्विधा मनस्थिति में देखकर, दया दिखाते हुए सोकर अपनी सपनों की दुनिया में खो जाती हो। उस क्षण हम उत्साहित, राहत और विजयी महसूस करते हैं। तब हमें ऐसा लगता है जैसे “विजय लक्ष्मी” ने ही हमारे सर पर हाथ रखा है।

उम्र और स्वभाव के अनुरूप तुम हर नई चीज को जिज्ञासु और उत्साही नजरसे देखती हो और “हे काय आहे ? हे काय आहे ?” (यह क्या है?) पूछते रहती हो। कभी-कभी तुम्हारे सवालों से हम परेशान हो जाते हैं, लेकिन हमारे परेशानी को नजरअंदाज कर बढ़ी ही मासूमियत से मुस्कराते हुए तुम बार-बार वही सवाल पूछते रहती हो। कई चीजों को बारे में तुम पहले से जानती हों, फिर भी आदत के मुताबिक तुम वही सवाल पूछते रहती हो, और अगर हम गलती से उसके बारे में गलत बोल दे तो जब तक हम अपनी गलती सुधारते नहीं तब तक तुम हमारा पीछा नहीं छोड़ती। आश्चर्यकी बात है की किताबें तुम्हारे खिलौनो के सूची में सबसे ऊपर हैं, जो हमारे लिए भगवान से मिले एक वरदान की तरह हैं। क्योंकि तुम्हे घंटो तक शांत, हसते, खेलते हुए व्यस्त रखने के लिए किताबों का उपयोग हम हथियार के तरह में करते हैं। महत्वपूर्ण बात, जब भी तुम अनियंत्रित रूप से रोती हो, तब ध्यान विचलित करके तुम्हे शांत करने लिए किताबें ही हमारी सहायता के लिए दौड़ी चली आती हैं। तुम्हारा जिज्ञासु, उत्साही मन और पुस्तकों के प्रति प्रेम देखकर लगता है कि तुम्हारे रूप में “विद्या लक्ष्मी” ही हमारे घर पधारी है।

घूमते या टीवी देखते हुए जो भी तुम्हे नजर आता है, वह या तो तुम्हारा या तुम्हारे माँ-पिताजी का होता है। तुम्हारा ऐसे कहते रहना काल्पनिक रूप से ही सही लेकिन हमें कई चीजों का मालिक बना जाता है, जिनमेंसे कई चीजोंके बारे में हम सपनेमें भी नहीं सोचते। तुम्हारे द्वारा हमें काल्पनिक रूपसे मालिक बनाया गया ऐसी चीजे हैं – बाघ, जिराफ, हिरण, हाथी, शार्क, विमान, ग्रह, और बहुत कुछ।
तुम बोलती हो वो हर शब्द हमें देवी सरस्वती के शब्द जैसा ही मधुर और प्यारा लगता है, “बाबा इक्के ये, कम (पिताजी इधर आईये)”, आना पल्ली (आर्ना गिर गयी), बनानाआआआआ, चिक्क्क्कुउउउउ, आंबाआआआ, आई बाबुदाना दे (माँ साबुदाना दो),”आई अप्रीकाट दे, पिता दे (माँ अप्रीकॉट, पिस्ता दो)” ,ओ दीदी (ओवी दीदी) तथा सारा दिन चलने वाली तुम्हारी बातो की गाड़ी का हर शब्द। बातें करते वक़्त तुम्हारे हावभाव, उच्चारण, स्वर, चंचलता, मासूमियत हमारे अनमोल यादों के भंडार को हर शब्द के साथ बढ़ाते रहते हैं।
ऑफिस से घर आते ही,मैं उम्मीद करता हु की सबसे पहले तुम्हे मुस्कुराते या नाचते हुए देखूँ, क्योंकि तुम्हे देखकर ही मुझे तनाव से मुक्ती, खोयी ऊर्जा, ख़ुशी, ताजगी वापस मिलती है, जो मुझे सशक्त, उत्साही और अमीर महसूस कराती है।
टीकाकरण या अन्य किसी भी कारण से रो रही तुम जब रोना बंद करती हो, उस वक़्त हमारे जान में जान आती है और हमें अनमोल खोया खजाना वापस मिलने की खुशी मिलती है।
रोज तुमसे कम से कम २ घंटे पहले हम उठते हैं और बेदिली से ही अपनी दिनचर्या जारी करते हैं। तुम्हे नींदसे उठाने के लिए हमारा मन नहीं मानता, लेकिन जब तक तुम उठती नहीं और तुम्हारे मुंह से निकला दिन का पहला शब्द हम सुनते नहीं, तब तक हम कोई भी काम पुरे दिल से नहीं कर पाते। तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा देखने के लिए और तुम्हारे मुँहसे “मम्मा”, “आई”, या कभी-कभी “बाबा” शब्द सुनने के लिए हम आतुर और उत्सुक रहते हैं। ये शब्द हमारे कानोंपर पड़ते ही हमारा शरीर सक्रिय और उत्साहित हो जाता हैं और पहले कभी ना किया हो ऐसे जोश में काम करना शुरू करता हैं। मानो सालो से इंतजार कर रहे थे वो चीज हमें मिल गयी हो। सबसे महत्वपूर्ण बात, ये खुशी और हसीं की संपत्ती तुम हर दिन हमें देती हो। यह सब अनमोल पल, खुशी, मौल्यवान यादे और किम्मति, निर्दोष हँसीकी संपत्ती, दो साल पहले हमारे घर पधारी “धन लक्ष्मी” ने हमें दियी हैं।

हमारे घर और मन में सहीमे “अष्ट लक्ष्मी” ही आर्ना के रूप में आयी है।

दिन-ब-दिन तुम बड़ी होती जा रही हो। साथ ही साथ हमारे जीवन में तुम्हारे वजहसे आनेवाली खुशी, ऊर्जा, मस्ती, यादें भी बढ़ती जा रही है। और यही हमारी असली संपत्ति हैं जिसे किसीभी और चीज से बदला नहीं जा सकता। आज तुम २ साल की हो गयी, लेकिन इन २ सालो में ही तुमने अपनी मस्ती,खेल, बाते, हँसी, चेहरे हावभाव, मासूमियत, रोना आदि से हमें इतना समृद्ध किया है कि अब और किसी चीज की अपेक्षा नहीं है। मुझे लगता है कि तुम हमेशा हमारी चंचल, प्यारी, मासूम, छोटी परी ही बनी रहो लेकिन ये समय कभीभी एक पिता का मन नहीं समझ पायेगा। इसलिए समय की वास्तविकता को स्वीकार करते हुए, तुम्हे तुम्हारे दूसरे जन्मदिन पर दुनिया की सभी खुशीया,उज्वल भविष्य और सफलता मिले यही सदिच्छा करता हु।

“Legend of Suheldev: King Who Saved India” (English) Book Review

Legend of Suheldev

“Legend of Suheldev – The King Who Saved India,” a historical fiction book, researched and written by a group of writers united under the banner, “An Immortal Writers Centre,” with the final touch or supervision by Amish Tripathi, a master of mythological fiction. It is the same book, previously announced as “Battle of Bahraich” by Amish, but due to lack of time, the group of writers molds the idea into a book.

The book is all about the King of Shravasti “Suheldev” who unite, formed, and led the confederate to save “Maa Bharati” from the foreign invader Mahmud of Ghazni’s destruction, robbing, and brutal massacre. Initially, by guerrilla war and finally, by a direct battle at Bahraich, he saved the “Maa Bharati” from these destructive invaders, brutal and blind followers of the religion who don’t value and respect others religions and hates them.

This book has all the masala that one can expect in an exciting, thrilling movie. The story revolves around series of events, start with the war death of Suheldev’s brother while saving Somnath temple from the Mahmud of Ghazni. Then mass and brutal killings, destruction of villages, and confidence of villagers, cruelty, robbing by Mahmud of Ghazni. Many Indian kings join hands and help him in destruction to save their kingdom and kingship. He used Hindu beliefs as weapons to destroy Hindu temples and kill people. Indian Kings and soldiers strictly followed all the battle rules, whereas he or Turks broke all the war rules, which gave them an upper hand. To stop any revolt in the future and keep people weak, Turks fights brutally, with the aim of “no mercy, no prisoners.” Suheldev swears to save “Maa Bharati” and take revenge for his brother’s death. He faces humiliation and non-cooperation from the other Indian kings because he is a non-Kshatriya and low caste king, which shows the impact of the Indian caste system on war against Turks. It explains his stand against the caste system and his role in breaking the barrier of caste. He forms a group of warriors for the Guerilla war and the destruction of Ghazani camps through small raids and attacks. 

While saving one village, lady Toshani becomes a part of the group with her heroism. She comes close and develops a bond with King and starts a silent love story, but they sacrifice their love to keep his dedication and focus on his goal and promise. The sudden death of his father and King shatters him, but the people, other kings, and officers of Indian Kings who joined hands with Mahmud of Ghazni trust, support, and help him in this war and accept him as a King.

In Peshawar, Turks destroy temples and Buddhist monasteries and burn monks, but some monks safely escape and join Suheldev in India. The story of the escaped monk Ashvaghosha is kept secret and unanswered suspense only known to monk Sanghamani. Ashvaghosha does well as a soldier.

How does Suheldev become the savior warrior and win a battle with his different, pragmatic, and unique thinking? How difficult to reach, help offered by the Chola Kingdom suddenly reaches the battleground? Why did the powerful and important peace-loving man of Ghazni help Suheldev to fight Ghazni? Who is he, what is his role in the battle, and how he helps Suheldev? How does Suheldev use Turk’s religious beliefs to warn and threaten them to ensure no foreign invaders attacks “Maa Bharati” in the future again? How Indian King Rajendra Chola plans political conspiracy and civil war in Ghazni by assassinating Mahmud is one more unanswered suspense? With this, more interesting and entertaining suspense is good to read in the book.

Along with this thrill, the story is written considering the rich Indian culture and secularism in mind brilliantly by picturing various characters and events. It explained how people from all religions fought together, honestly for the single motto to save “Maa Bharati” from foreign invaders.

The characters Ashvagosha, Sanghamani, Toshani, Aslan, Abdul, Govardhan, Kashinath, Kerim, Salar Masud, Salar Maqsad, King Ajitpal, Jaichand, with some more, are used very precisely to plot events, to tell history through a good fictional story. It is a historical fiction book, so the writer used the freedom to mold the story, add events, characters, etc., as per his thought and convenience to create a good story. The book ends with some questions in the reader’s mind, which opens the possibility of the next book in the series.

The book doesn’t have the writing strength, like Amish’s previous books, but for the story of King Suheldev, his fight against the caste system, his role to form confederate to stop the destruction of villages, empires of Maa Bharati by Turks invaders, reconstruction of Somnath temple, Battle of Bahraich, to get some additional historical knowledge, and most importantly for “the Lost Hero of Indian History – King Suheldev” you can read it (but keep one thing in mind the character is real but the story is fictional).

“द्रौपदी का महाभारत” “पॅलेस ऑफ इल्यूजन (भ्रम का महल)” – चित्रा बनर्जी दिवाकरुनी – Book Review

Good Book to Read

“पैलेस ऑफ इल्यूजन” या “द्रौपदी की महाभारत”, एक अलग चरित्र के दृष्टिकोण से देखी गई महाभारत की आकर्षक कहानी मतलब यह किताब है। महाभारत का एक मुख्य और महत्वपूर्ण पात्र पांचाली या द्रौपदी या क्रिष्णा के नजरसे देखते हुए एक नये लेखकका दृष्टिकोण इस किताब में पढ़ने मिलता है। शीर्षक “पैलेस ऑफ इल्यूजन (भ्रम का महल)” पुस्तक को पूरी तरह से सूट करता है, क्योंकि लेखक ने पांचालीके बचपन से लेकर मृत्यु तक की जीवनयात्रा में “पैलेस ऑफ इल्यूजन” पर ही ध्यान केंद्रित रखा है।

जब घटनाओं, पात्रों, कहानियों को बदलने या उनमें हेरफेर करने का कोई अवसर नहीं होता तब मुख्य कहानी के मुख्य पात्रों में से एक के दृष्टिकोण से पूरी पुस्तक लिखना आसान नहीं है। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात,यह है की यह कार्य और भी कठिन हो जाता है, जब आप प्रसिद्ध, महान, सर्वश्रेष्ठ और अब तक लिखी गयी सबसे बड़ी पौराणिक किताब के एक प्रमुख पात्र के दृष्टिकोण से कहानी लिखते हैं।लेकिन लेखक चित्रा बनर्जी दिवाकरुनी ने उस कठिन कार्य को बहुत ही अच्छी तरह से निभाया है और पाठकों को एक अच्छी किताब उपहार दी है। संक्षेप में, यह (काल्पनिक या सत्य?) पौराणिक कथापर आधारित काल्पनिक किताब है।

किताब के बारे में दो बातें थोड़ी अजीब लगती हैं। पहली बात,थोड़ी महत्वहीन की दुर्योधन की बहन दुशला परिवार की वंशवृक्ष से गायब है (जो किताब महाभारत में एक मुख्य महिला पात्र के दृष्टिकोण से और एक महिला द्वारा लिखित है उसमें ऐसा होना थोड़ा आश्चर्यचकित कर जाता है )।

दूसरी बात, द्रौपदी के मन में कर्ण के बारे में “स्वयंवर” (संभवत: जिस समय से वह कर्ण तस्वीर देखती है तब से) से लेकर उसकी मृत्यु तक दिखाया गया एकतरफा प्यार, चिंता, सम्मान और आकर्षण है। खासकर उसकी शादी के बाद हर महत्वपूर्ण घटनामें कर्ण का उल्लेख या द्रौपदी के मनमें कर्ण का विचार चित्रित किया है। इस प्रेम का उल्लेख करने या उसके बारे में लिखने वाली यह पहली किताब है ऐसा नहीं है। इसे स्वीकार करना या नहीं करना, इसे किस तरीके से देखना यह पूरी तरह से पाठक, उसकी मानसिकता और उसके दिमाग में कर्ण की छवि पर निर्भर करता है। कर्ण केवल कुंती का सबसे बड़ा पुत्र है इसलिए या शायद किसी अन्य वजहसे, कर्ण के प्रति द्रौपदी का प्यार, चिंता और आकर्षण दिखाना आवश्यक नहीं है। पूरी किताबे में लिखित ज्यादातर घटनाओं में द्रौपदी का कर्ण के प्रति प्यार, चिंता, आकर्षण और सम्मान दिखाया है।अंततः, इस कल्पना या तथ्य को कैसे दिखाना, लिखना, इसके के बारे में क्या सोचना, यह पूरी तरह लेखक की अभिव्यक्ति स्वतंत्रता, विचार, लेखन शैली और पाठक की सोच, मानसिकता के संयोजन और मिलाप की बात है।

महिलाओं की स्वभाव में हर छोटी से छोटी चीज, जैसे की उनकी जिज्ञासा, ईर्ष्या, क्रोध करना, संदेह करना, प्रतिस्पर्धा करना, आपत्ति करना, पुरानी (गलत) परंपराओं पर उंगली उठाना, उनका विरोध करना, अपनी छोटी-छोटी चीजों पर गर्व करना, गहने, कपड़े, घर सजाने जैसे अलग अलग चीजों का आकर्षण, उनसे लगाव, प्यार, उनका धैर्य, धीरज, संयम, उनसे होनेवाली जबरदस्ती, उनकी सोच, उनका स्वभाव और अन्य कई छोटी-छोटी चीजें सोच-समझकर और बहुत अच्छी तरह से किताब में प्रस्तुत कियी हैं, जो किताब की ताकद है। द्रौपदी की राज्य के शासन-प्रशासन में, नियम कायदे बनाने में, महिलाओं के अधिकारों, प्रगति, वैचारिक उलझाव में, और इसके लिए उनके नेतृत्व और संघर्ष वाली भूमिका के साथही कई जगहों पर एक महिला के रूप में उनकी लाचारी, कमजोरी, होने वाला असहयोग, उनके साथ होनेवाला व्यवहार, उनके विचार,निर्णय की होनेवाली उपेक्षा, आदि सब चीजों को भी बहुत ही अच्छी तरह से लिखा गया हैं। द्रौपदी का भाई द्रुष्टद्युम्न, शिखंडी, धाय माँ के प्रति प्यार, लगाव, स्नेह, उनका बचपन, शिक्षा, उनके पिता द्रुपद के जीवन में उनका स्थान, द्रौपदीके जीवन में द्रुपद का स्थान,विवाह से पहले पिता के महल में व्यतीत जीवनकाल को बहुत ही आकर्षक रूप से दर्शाया गया है। कुंती के साथ उनके रिश्ते को वर्तमान स्थिति के बेटा-सास-बहु के रिश्ते को ध्यान में रखते हुए लिखा गया हैं, पांडवों का जीवन, शैली, स्वभाव को अपने नियंत्रण में रखने के लिए कुंती के साथ द्रौपदीका शीत युद्ध, तनाव, खेले जाने वाले दांवपेच,अपने पसंद जैसा, खुदका सुंदर,प्यारा,बड़ा, पुरे स्वंतंत्रता के साथ जैसा वह चाहती है वैसा शानदार महल बनाने की द्रौपदी की इच्छाको बहुत ही अच्छी तरह से वर्णित किया गया हैं।

महाभारत, उस पर आधारित किताबें,कहानी, कथाये महत्वपूर्ण पात्र “श्रीकृष्ण” के बिना पूरी नहीं हो सकती। इसलिए, द्रौपदी के जीवन में या महाभारत में “श्रीकृष्ण” की भूमिका का अलग से उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है। इस किताब में भी “श्रीकृष्ण” की भूमिकाको बहुत ही अच्छी तरह से वर्णित किया है। किताब मुख्य रूप से द्रौपदी, उसके जीवन संबंधित या उसके कहानीको प्रभावित करनेवाली महाभारत की घटनाओं पर केंद्रित है।

पांचाली, यज्ञ से जन्मी तेजस्वी कन्या। द्रोणाचार्य के छात्र पांडवों के खिलाफ युद्ध हार और उनका युद्धबंदी बनने के बाद राजा द्रुपद अपमानित और अस्वस्थ हो जाता है। द्रोणाचार्य की शक्ति और ज्ञान पता होने के वजहसे, द्रोणाचार्य की हत्या कर अपमान का बदला ले सके ऐसे पुत्र की प्राप्ति के लिए राजा द्रुपद यज्ञ करते हैं। यज्ञ से राजा द्रुपद के इच्छानुसार पुत्र द्रष्टद्युम्न और अवांछित उपहार पुत्री द्रौपदी उत्पन्न होते है और साथ ही एक भविष्यवाणी भी होती है। भविष्यवाणी बताती है कि यह लड़की इतिहास का मार्ग बदलने में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगी। द्रौपदी ने इतिहास को कैसे बदला या इतिहास बदलने में उसकी क्या भूमिका थी, इसकी कहानी हम महाभारत से अच्छी तरह जानते है, फिर भी वो कहानी इस मनोरंजक किताब में पढ़ना रोमांचक और दिलचस्प है।

किताबमें कुछ पंक्तियाँ बहुतही अच्छी लिखी गई हैं। जैसे शिखंडी द्रौपदी को कहता है “(महिला) अपने सम्मान का बदला लेने के लिए पुरुष की प्रतीक्षा करेगी और वह प्रतीक्षा ही करती रहेगी”, या द्रौपदी के शिक्षासे “उम्मीदें रास्ते में छिपे पत्थरों की तरह हैं – वे सिर्फ आपको ठोकर ही देती हैं या आपसे गलतिया ही करवाती है”।

द्रौपदी और उसका “पॅलेस ऑफ इल्यूजन (भ्रम का महल)” जो उसे द्युत क्रीड़ा और युद्ध के बाद छोड़ना पड़ा था, ऐसा एक पूरा हुआ सपना और जिससे वह अपनी मृत्यु तक प्यार करती रही, इन दो चीजों के लिए यह किताब अवश्यही पढ़ने लायक है।

“द्रौपदीचे महाभारत” “पॅलेस ऑफ इल्यूजन (भ्रमित करणारा वाडा)”” – चित्रा बनर्जी दिवाकरुनी – Book Review

Good Book to Read

“पॅलेस ऑफ इल्यूजन” किंवा “द्रौपदीचे महाभारत”, एका वेगळ्या परंतु मुख्य पात्राच्या दृष्टीकोनातून बघण्यात आलेली महाभारताची आकर्षक कहाणी म्हणजे हे पुस्तक. महाभारतातील मुख्य आणि महत्त्वपूर्ण पात्र पांचाली किंवा द्रौपदी किंवा क्रिष्णाच्या नजरेतून बघत नवीन लेखकाचा दृष्टिकोन या पुस्तकात वाचायला मिळते. “पॅलेस ऑफ इल्यूजन” हे शीर्षक पुस्तकाला उत्तम शोभले आहे कारण लेखकाने पांचालीच्या बालपण ते मृत्यूपर्यंतच्या संपूर्ण प्रवासात तिच्या “पॅलेस ऑफ इल्यूजन (भ्रमित करणारा वाडा)” यावरच लक्ष केंद्रित ठेवले आहे.

प्रसंग, पात्र, कथा बदलण्याची किंवा त्यासोबत थोडी सुद्धा छेडछाड करण्याची कुठलीही संधी नसताना, मुख्य कथेतील एका प्रमुख पात्राच्या दृष्टिकोनातून संपूर्ण पुस्तक लिहिणे सोपे नाही. विशेषतः जेव्हा तुम्ही आजतागायत लिहण्यात आलेल्या प्रसिद्ध, महान, सर्वोत्कृष्ट आणि सर्वात मोठ्या पौराणिक पुस्तकाच्या मुख्य पात्रांपैकी एकाच्या दृष्टिकोनातून कथा लिहायला घेता तेव्हा तर हे अजूनच अवघड होते. पण लेखक चित्रा बॅनर्जी दिवाकरुनीने ते अवघड खूप चांगल्या प्रकारे पार पाडले आहे आणि एक उत्तम पुस्तक वाचकांना भेट दिले आहे. थोडक्यात, (काल्पनिक किंवा सत्य?) पौराणिक कथा मूलाधार असलेले हे एक कल्पनांवर आधारित पुस्तक आहे.

पुस्तकामधील दोन गोष्टी थोड्या खटकल्या सारख्या होतात. पहिली, नगण्य अशीच म्हणजे दुर्योधनाची बहीण दुश्शाला, कौटुंबिक वंशावळीत दाखवण्यात आलेली नाही (महाभारतातील एका मुख्य स्त्री पात्राच्या दृष्टिकोनातून आणि एका स्त्रीनेच लिहिलेले हे पुस्तक असल्यामुळे हे थोडे अचंभित करते).

दुसरी गोष्ट म्हणजे कर्णाबद्दल द्रौपदीच्या मनात “स्वयंवरा” पासून (कदाचित छायाचित्र बघते तेव्हापासून) ते मृत्यूपर्यंत दाखवण्यात आलेले एकतर्फी प्रेम, काळजी, आकर्षण आणि आदर. विशेष म्हणजे तिच्या लग्नानंतर प्रत्येक महत्वाच्या घटनेमध्ये कर्णाचा उल्लेख अथवा तिच्या मनात त्याचाच विचार आहे असे चित्रित करण्यात आले आहे. या प्रेमाबद्दल उल्लेख केलेले हे पहिलेच पुस्तक आहे असे नाही. ते मान्य करणे किंवा न करणे हे पूर्णपणे वाचकांवर, त्यांच्या विचारांवर, त्यांच्या मानसिकतेवर आणि त्यांच्या मनातील कर्णाची प्रतिमा इत्यादीवर अवलंबून आहे. कर्ण फक्त कुंतीचा थोरला पुत्र आहे किंवा इतरही कुठल्या कारणांमुळे पांचालीचे त्याच्या प्रति प्रेम, काळजी आणि आकर्षण दर्शविणे आवश्यक नाही, विशेषतः महाभारताच्या मुख्य कहाणीच्या प्रवाह बाहेर जाऊन. पुस्तकामधील विविध प्रसंगामध्ये पांचालीचे कर्णा प्रतिचे प्रेम, काळजी, आकर्षण आणि आदर दर्शविण्यात आला आहे. शेवटी ही बाब किंवा वस्तुस्थिती दर्शविणे अथवा नाही हा प्रश्न पूर्णपणे लेखकाच्या अभिव्यक्ती स्वातंत्र्य, विचार, लिहण्याची पद्धत आणि वाचकांची विचारसरणी, मानसिकता यांच्यातील जडणघडण यातील आहे. 

स्त्रियांच्या स्वभावातील बर्‍याच लहान लहान गोष्टी,उदाहरणार्थ उत्सुकता, मत्सर, राग,शंका करणे, स्पर्धा करणे,आक्षेप घेणे, जुन्या (चुकीच्या ) परंपरांवर बोट उचलणे, विरोध करणे, स्वत: च्या लहान लहान गोष्टींबद्दल अभिमान, विविध गोष्टींची, दागदागिने, कपडे, घर सजवणे यांची आवड,सहनशक्ती, संयम,होणारी सक्ती, त्यांचे स्वभावगुण आणि इतरही बऱ्याच गोष्टी पुस्तकात विचार पूर्वक आणि खूप चांगल्या प्रकारे मांडण्यात आल्या आहेत, हेच पुस्तकाची जमेची बाजू आणि ताकद आहे. द्रौपदीची प्रशासनात, स्त्रियांच्या हक्क आणि प्रगतीसाठी घेतलेली भुमिका, घेतलेले पुढारीपण, वैचारिक जडणघडण या सोबतच अनेक ठिकाणी एक स्त्री म्हणून तिची होणारी हेटाळणी, असहायता, दुबळेपणा, होणारा असहकार, मिळणारी वागणूक, तिच्या मतांकडे करण्यात येणार दुर्लक्ष इत्यादी गोष्टीदेखील खूप चांगल्या पद्धतीने लिहण्यात आल्या आहे. द्रौपदीचे भाऊ द्रुष्टद्युमन, शिकंडी, धाय मा यांच्यावरील प्रेम, त्यांच्याबद्दल असणारी आपुलकी, तिचे बालपण, शिक्षण, वडिलांच्या आयुष्यातील तिचे स्थान, तिच्या आयुष्यातील द्रुपदचे स्थान, तिच्या लग्नाच्या आधीच्या किंवा तिच्या वडिलांच्या राजवाड्यातील घटना अतिशय आकर्षकपणे दर्शविलेल्या आहेत. तिचे कुंतीशी असलेले संबंध सध्याच्या परिस्थिती मधील मुलगा-सासू-सुनेचे संबंध लक्षात ठेवूनच लिहिण्यात आले आहे, पांडवांचे जीवन, निर्णय स्वतःच्या नियंत्रणामध्ये ठेवण्यासाठी कुंतीबरोबर तिचे चालणारे शीत युद्ध, डावपेच, स्वतःच्या इच्छेनुसार,आवडीनुसार हवा तसा स्वतःचा सुंदर, आलिशान राजवाडा बांधायचा ध्यास खूपच चांगल्या प्रकारे वर्णविण्यात आला आहे.

महाभारत, त्यावर आधारित पुस्तके, कथा “श्रीकृष्ण” या महत्वाच्या पात्राशिवाय पूर्णच होऊ शकत नाहीत. म्हणून श्रीकृष्णाचा द्रौपदीच्या जीवनात किंवा महाभारतातील भूमिकेविषयी वेगळा उल्लेख करण्याची गरजच नाही. श्रीकृष्णाच्या भूमिकेचे किंवा पात्राचे समर्पक आणि सुंदर वर्णन पुस्तकात केले आहे. या पुस्तकात मुख्यत: द्रौपदीच्या संबंधित किंवा तिच्या आयुष्याला, कथेला प्रभावित करणाऱ्या महाभारतातील घटनांवरच लक्ष केंद्रित केले आहे.

पांचाली, यज्ञातून जन्मलेली तेजस्वी कन्या. द्रोणाचार्याचे विद्यार्थी पांडवांविरूद्ध युद्धात पराभूत होऊन, युद्धबंदी बनल्यानंतर द्रुपद अपमानित आणि अस्वस्थ होतो. द्रोणाचार्यांची शक्ती आणि विद्या माहिती असल्यामुळे, द्रोणाचार्यांचा वध करून आपल्या झालेल्या अपमानाचा योग्य बदला घेणाऱ्या साहसी व समर्थ पुत्रासाठी द्रुपद यज्ञ करतो. यज्ञामधून, राजा द्रुपदला इच्छित मुलगा द्रुष्टद्युमन आणि अवांछित भेट द्रौपदीची विशेष भविष्यवाणीसह उत्पत्ती होते. द्रौपदीच्या जन्माच्यावेळी भविष्यवाणी होते की ही मुलगी इतिहासाचा मार्ग बदलण्यात खूप मोठी भूमिका निभावणार आहे. आणि द्रौपदीने इतिहास कसा बदलला किंवा त्यात तिची काय भूमिका होती याची कहाणी सर्वांना महाभारतातून माहितीच आहे तरी पण या मनोरंजक पुस्तकात वाचणे रोमांचक आणि कुतूहल निर्माण करणारे आहे.

पुस्तकामध्ये काही ओळी खूपच छान लिहिल्या आहेत. उदा. शिखंडी द्रौपदीला म्हणतो “(स्त्री) आपल्या सन्मानाचा बदला घेण्यासाठी एखाद्या पुरुषांची वाट बघेल आणि ती कायमच वाट बघत राहील “, किंवा द्रौपदीच्या शिक्षणा दरम्यानची ओळ “अपेक्षा मार्गातील लपलेल्या खड्यांसारख्या असतात – ते फक्त तुम्हाला ठेचाच देतात किंवा तुमच्याकडून चुकाच करवतात “

द्रौपदी आणि तिच्या “पॅलेस ऑफ इल्यूजन”(भ्रमित करणारा वाडा) जे द्यूत क्रीडा व युद्धानंतर सोडावे लागलेले तिचे पूर्ण झालेले एक स्वप्न होते आणि ज्यावर तिचे मृत्यूपर्यंत नितांत प्रेम होते, ह्या दोन गोष्टींसाठी हे पुस्तक अवश्य वाचण्यासारखे आहे.

“The Palace of Illusions” – Chitra Banerjee Divakaruni – Book Review

Good Book to Read

“The Palace of Illusions” is the story of the fascinating Mahabharata written from another character’s perspective. The point of view of an author looks at the Mahabharata story from the eyes of one of the pivotal characters Paanchali, alias Draupadi, alias Krishnaa. The title “The Palace of illusions” suits the book and a story revolving around Panchali and The Palace of illusion. 
The book writing is challenging when written from the pivotal character’s point of view without playing with the events, characters, or basic story. And it becomes difficult if written from the view of the character of the longest and the famous mythological epic books ever.

Personally felt odd or not convinced about two things in the book. First, a negligible one is Dushaala, Duryodhana’s sister is missing in the family tree. It’s odd because it is a book written by women and from a female point of view.

The second thing is Panchali’s hidden love, care, attraction, and respect for Karna. It’s started the day she saw his picture or “Swayamvar” till her last breath. She thinks about him in the important functions, and he is always in her heart. But it’s not the first book where such things are mentioned, shown, or written. To accept it or not completely depends on the reader or reader’s mindset, thinking, and the image of Karna in mind, etc. Just because he is Kunti’s eldest son or maybe due to some other reasons, it is not necessary to show the Panchali’s love, care, and attraction for him, and that also goes out of the Mahabharata’s base track. An entire book, events are written which show her love, care, attraction, and respect for him. Finally, it is a matter and fact between the author’s freedom of expression, thinking, writing style and readers’ thinking, mentality, etc.
A book or story based on Mahabharata is incomplete without mentioning “Shri Krishna.” So no need to mention Shri Krishna’s role in Draupadi’s life or Mahabharata separately, which is pictured very precisely and nicely. The Mahabharata events that are related to  Draupadi were in the book specifically.

A precise description of aspects of a woman’s nature is a strength of the book. Their nature aspects like curiosity, jealousy, anger, doubt, to compete, to object, to question traditions, pride about own things, love and affection for jewelry, clothes, home decorating, patience, compulsion, etc. Draupadi’s role in the administration, her struggle for women’s rights along with her helplessness, how her opinions are neglected in the assembly, such things are pictured precisely. Her love for brother Dhri, Shikandi, Dhai Ma is descriptive. Her childhood, education, her place in her father’s life, Drupad’s place in her life, events before her marriage, her life at her father’s palace are attractive. Her relation with Kunti is described considering the current age son-mother-daughter-in-law relation. Her cold war with Kunti to control the life of Pandavas, struggle to build her palace as per choice is written well descriptive.

Panchali is the girl born from yagnya (sacred fire). Drupad lost a war against the students of Dronachaya, Pandavas. He knew the power of Dronacharya, insulted and upset Drupad performs Yagnya to get the son who will kill Dronacharya and take revenge. A son Drushtadyumn and an unwanted gift Draupadi born from yagnya with a prophecy for King Drupad. As per prophecy, the girl will change history. The story of how she changed everything we knew from Mahabharata but is still exciting and thrilling to read in an entertaining book.

The book has some very catchy lines that are written well, like Shikandi to Draupadi “wait for a man to avenge your honor, and you’ll wait forever,” or line from Draupadi’s learnings “expectations are like hidden rocks in your path – all they do is trip you up.”

It is a must-read book for Draupadi and her “the Palace of illusions,” her passion and a fulfilled dream left behind after the game and war.

Daughter…AshtaLakshmi

Aarna …Bundle of Happiness

Little Hands of Ashtalakshmi Aarna

In Maharashtra whenever a girl child is born, people congratulate by saying “Abhinandan Lakshmi aali or Dhanachi peti aali” (congrats goddess Lakshmi is born or wealth came). Till the time you are born I was thinking, it was just a simple phrase prevalent, after some father got sudden wealth or profit on her daughter’s birth.

But after your birth, the first time when I took you in the arms and looked at your tiny hands, little fingers, black eyes, and head smaller than my palm, at that moment every single drop of tears flowed from eyes are invaluable and those memories are so precious that nothing can replace that moment and memories. This was the first sign given by destiny that “Adi Lakshmi” is born by blessings of “Santana Lakshmi“.

Your love about food, especially very specific and particular about the taste, color, variety, and presentation of food, keep us thinking about your healthy meals all the time so that you will finish it in one go sitting in one place. After research and efforts taken on your food, the moment when you finish the entire food served on the plate and smile (the quantity that we think is enough irrespective of your stomach, age, or what you had before that). At that moment we are top of the world and feel like a relief. It gives us a feeling that “Dhanya Lakshmi” is showering blessings on us.

Sometimes you drain our energy with your heroics activities, games, or stunts, but with your smile, dance, cuteness, and various “Nautanki” activities you help us to regain it soon. When you smile, we immediately forget all the tiredness and feel refreshed. We feel like blessed by “Dhairya Lakshmi“, with the power to endure stress, pain, and tiredness with energy and patience. Your stunts on jhula, bed, chair, dining table, sofa, stairs, a toy car, it gives us a feeling that “Veera Lakshmi” is living with us.

You as a child live with your own rule of “too late to bed, late to rise”, so we put all the war level efforts to make you sleep early. So that once your journey to the dream world starts, we can take rest to regain our energy for the next day. To make you sleep we keep trying methods like music, dance, reading, etc, but every night you gain double energy to in vain our efforts. We keep trying to sleep you, but finally lost and tired we manage to keep our eyes open with the slept mind and brain. May be looking at our condition you feel pity for us and start your journey to dreamland in a train of sleep. At that moment we feel like Gladiator with the hand of “Vijaya Lakshmi” on our head.

Your parents are not animal lovers and try to stay away from them. But we don’t know, from where you got the nature of loving animals, especially the Dog and Elephants are your favorites. Whenever you get a chance to watch any animal on TV, Laptop, mobile, toy shop, or anywhere else your energy, happiness, and excitement are overloaded which is reflected in your high node noise. An animal is in the picture, toy or real, it really doesn’t matter to you. Looking at your love for animals, it gives us the happiness of staying with “Gaja Lakshmi”.

You as a child and curious by nature, so you keep asking continuously “He kay ahe?” (What is this?) looking at every new thing. Sometimes we get irritated but you ignoring our irritation and keep on asking with innocence. Many times you already know about the things, but still, you keep asking. If by mistake we told wrong about a pointed thing, you keep asking till we correct it. Surprisingly books are top in your toys list and god’s gift to us. We use it as a weapon to keep you busy, quiet, silent, entertained for hours. The most important way that we use books, is to distract you when you cry uncontrollably. Your curious mind and love for books, help us to serve “Vidya Lakshmi”.

Each thing which comes under your eye scanner on TV or during roaming is either yours or parents, which make us at least virtually the owner of many things, which we never think to own in dreams also. The list of our virtual ownership contains- tigers, giraffes, deers, elephants, sharks, planes, planets, and many more.

Each word you say is like a songful word from Goddess Swarswati “Babaaaaa Ikke ye, come” (Dad come here), “Aana Palli (Aarna fell), bananaaaaa, chikkkkuuuu, aambaaaa, “Aai babudana de” (Mamma give me Sabudana), “Aai Aprikaat de, Pitaa de (pistachio) “, O didi (Ovi didi) and many more from your “Chatter Box”. While saying that words your action, pronunciation, tone, and expression are priceless and precious.

The moment I reach home from the office, the first thing I expect is to see you smiling or dancing, so that I will gain my drained energy, happiness, and relief from stress which makes me wealthier than anybody else for the moment.

The moment you stop crying after vaccination or any other reason, that moment we get the happiness of getting priceless treasures.

We wake up at least 2 hours before you and continue with our routine half-heartedly, as we don’t want to wake you up, but until you wake up and say the first word of a day, we can not concentrate on anything. We keep expecting to see your smiling face or hear the word Mamma, Aai, or rarely Baba as a kick start for a day, the moment these words reach our ears, our senses become active and energetic and we start working enthusiastically, that happiness is like getting something that we were waiting from many years. And the most important thing is, this wealth of happiness we are getting daily.

All this wealth of priceless moments, precious memories, happiness, and invaluable smiles are given to us by the incarnation of “Dhana/ Aishwarya Lakshmi” born at our home two years back.

For us, it’s “Ashta Lakshmi” come home with the name Aarna.

The day by day you are growing and you lighting our life with happiness, joy, energy, memories, energy. That things are our real wealth which is not replaceable. Today you turned 2, but in these 2 years only, you made us so rich, with your cuteness, energy, talking, smiling, expressions, crying, innocence, etc. that nothing else to wish. Personally, I want you to be a cute little angel of ours and never grow but time will never read the mind and heart of the father. Accepting the reality of the time, on your second birthday wishing you all the happiness, success, bright future, and joy of the world.

कन्यारत्न….अष्टलक्ष्मी

आर्णा…आनंदाची चावी

Little Hands of our Ashtalakshmi Aarna

महाराष्ट्रामध्ये कन्येचा जन्म होतो, तेव्हा “अभिनंदन लक्ष्मी आली किंवा धनाची पेटी आली” म्हणत अभिनंदन केले जाते. तुझा जन्म होईपर्यंत मला वाटायचे, एखाद्या कन्येच्या वडिलांना तिच्या जन्मानंतर अचानक धनलाभ किंवा आर्थिक नफा झाल्यामुळे प्रचलित झालेला हा एक साधा वाक्प्रचार आहे.

पण तुझ्या जन्मानंतर, जेव्हा मी तुला पहिल्यांदा हातात घेतले आणि तुझे इवले-इवले हात-बोट, छोटे काळे डोळे आणि माझ्या तळहातापेक्षा पण लहान डोके बघितले, तेव्हा डोळ्यांतून निघालेल्या आनंदाश्रूंचा प्रत्येक थेंब खूप अनमोल आहे आणि त्या आठवणी इतक्या मौल्यवान आहेत की त्या आठवणींनीची आणि क्षणांची जागा दुसरं काहीच घेऊ शकत नाही. हे सर्व बघता, आपल्या घरी “संतान लक्ष्मी“च्या आशीर्वादाने “आदि लक्ष्मी” चे आगमन झाले आहे हे कळायला मला वेळ लागला नाही.

तुझं अन्नपदार्थावर खूप प्रेम, त्यात पण विशेषत: तू पदार्थांच्या चव, रंग आणि सादरीकरणाबद्दल थोडी जास्तच जागरूक आणि सतर्क असल्यामुळे, तु एकाच जागी बसून हसत-हसत लवकरात लवकर जेवण संपवावे म्हणून तुझ्याकरिता रुचकर आणि आरोग्यदायक आहार बनवण्याच्याच विचारात आम्ही मग्न असतो. तुझ्या जेवणातील पदार्थांवर केलेल्या चर्चा, संशोधन आणि प्रयत्नांनंतर, जेव्हा तू ताटामध्ये वाढलेले पूर्ण अन्न संपवून समाधानाने गोड हसते, तेव्हा आम्हाला पण पोट भरल्या सारखं वाटते ( तुझं पोट, वय, किंवा त्यापूर्वी काय आणि किती खाल्ले होते याकडे दुर्लक्ष करत आम्हाला योग्य वाटते तितके तुझ्या ताटात वाढतो आणि ते तू संपवावे हि अपेक्षा करतो). जेव्हा तू ताटामधले अन्न संपवते त्याक्षणी आम्हाला आकाश ठेंगणे पडते आणि सोबतच आपल्यावर “धान्य लक्ष्मी” ची कृपा झाली अशी भावना मनात येते.

तुझ्या मागे धावून आणि तुझ्या धाडसी कृती, खेळण्या किंवा शूर कृत्यापासून तुझा बचाव करता करता आम्ही थकून जातो परंतु तू तुझ्या स्मित, नृत्य, खट्याळ, गोंडस, मोहक आणि विविध “नौटंकी” ने आमची ऊर्जा आणि उत्साह परत मिळवून देऊन, दुप्पट जोमाने काम करायला प्रेरित करते. तूला हसतांना बघून आम्ही आमचा सर्व थकवा विसरून लगेच ताजेतवाने होतो, जणू “धैर्य लक्ष्मी” ने आम्हाला आशीर्वाद म्हणून वेदना आणि थकवा सहन करण्याची शक्ती आणि संयमच दिला आहे. झुला, पलंग, खुर्ची, जेवणाचा टेबल, सोफा, पायऱ्या, खेळण्यातील कार वर, बाहेर फिरायला जातांना वगैरे वयाच्या मानाने तु केलेले मोठे मोठे धाडसी कृत्य “वीर लक्ष्मी” आमच्याबरोबर राहत आहे याचीच जाणीव करून देत असतात.

तुझ्या आई-बाबा दोघांना पण प्राणी आवडत नाहीत, म्हणून ते नेहमी प्राण्यांपासून थोडं दूरच राहण्याच्या प्रयत्नात असतात. इतके असून सुद्धा कुठून तुझ्या मनात प्राण्यांबद्दल विशेष आपुलकी आणि प्रेमभाव उत्पन्न झाला देवच जाणे. त्यात पण कुत्रा आणि हत्ती तर तुझ्या विशेष प्रेमाचे धनी आहेत. जेव्हा पण तुला टीव्ही, लॅपटॉप, मोबाईल, खेळण्याचे दुकान किंवा इतर कोठेही प्राणी पाहण्याची संधी मिळते तेव्हा तुझ्या आनंद आणि उत्साहला भरती आली आहे हे तुझ्या वरच्या सुरातील आवाजातून लगेच दिसून येते. दिसणारा प्राणी चित्रात, खेळण्यात, टीव्ही मध्ये आहे की वास्तविक आहे याचा तूला काहीच फरक पडत नाही, प्रत्येक वेळी तुला सारखाच आनंद होतो . प्राण्यांवरील तुझे हे प्रेम बघून “गज लक्ष्मी” आमच्या अंगणात रांगते आहे याचाच आनंद आम्हाला होतो.

लहान खेळकर बाळ तू, आपल्या स्वत:च्याच ” उशीरा झोपणे, उशिरा उठण्याच्या ” नियमासह जगते. म्हणून तू लवकर झोपावे यासाठी आम्ही युद्ध पातळीचे सर्वच प्रयत्न करतो. जेणेकरून तू एकदा स्वप्नातील रंगेरी जगाकडे तुझा प्रवास सुरू केला की, आम्ही सुद्धा विश्रांती घेऊन दुसर्‍या दिवसाच्या कामांसाठी ताजेतवाने होवू शकु. अंगाईगीत, भजन, नृत्य, वाचन इत्यादी विविध पद्धतीने आम्ही तुला झोपवण्याचा प्रयत्न करत असतो. परंतु रोज रात्री आमच्या प्रयत्नांना व्यर्थ करण्याची दुप्पट ऊर्जा तुला कुठून मिळते देवच जाणे. तुला झोपवण्याचा आम्ही आटोकाट प्रयत्न करतो, परंतु थकलेले आणि मानसिकरित्या झोपलेले आम्ही कसे तरी डोळे उघडे ठेवतो. आमची ही अशी स्थिती बघून कदाचित तुला आमच्याबद्दल कळवळा वाटतो म्हणून आमच्यावर दया दाखवत झोपी जाते आणि स्वप्नेरी दुनियेतील प्रवास सुरू करते. त्याक्षणी आम्हाला एकदम उत्साही आणि विजयी झाल्यासारखे वाटते. तेव्हा “विजय लक्ष्मी” चाच हात डोक्यावर आशीर्वाद देत आहे अशी भावना मनात येते.

तु उत्सुक, जिज्ञासू स्वभाव आणि वयामुळे प्रत्येक नवीन गोष्टीकडे बघितल्या बघितल्या “हे काय आहे? हे काय आहे?” विचारते. तुझ्या या सततच्या प्रश्नांनी कधीकधी आम्ही त्रासून जातो परंतु आमच्याकडे दुर्लक्ष करत तू आपल्या निर्दोष हसत मुखाने तोच प्रश्न विचारत राहते. बर्‍याचदा दाखवत असलेल्या गोष्टींबद्दल तुला आधीपासूनच माहिती असते तरीही सवयीप्रमाणे तू “हे काय आहे?” विचारतेच आणि चुकून त्याबद्दल भलतंच काही सांगितले तर आम्ही चूक सुधरवत नाही तोपर्यंत तू प्रश्नाचा भडीमार करत पिच्छा पुरवत राहते. एक आश्चर्याची गोष्ट म्हणजे पुस्तकं तुझ्या खेळण्यांच्या यादीमध्ये शीर्षस्थानी आहेत आणि जणू देवानी आम्हाला दिलेली ही एक जादूची काडीच आहे, कारण तुला तासनतास शांत, हसत, खेळत, करमणुकीत मग्न ठेवण्यासाठी पुस्तकांपेक्षा दुसरा रामबाण उपाय नाही. विशेष म्हणजे जेव्हा तू अनियंत्रितपणे रडत असते तेव्हा पुस्तकच आमच्या मदतीला धावून येतात आणि तुझे लक्ष विचलित करून तुला शांत करतात. तुझे उत्सुक, जिज्ञासू असलेले मन आणि पुस्तकांबद्दल असलेले प्रेम बघता आम्ही “विद्या लक्ष्मी” चीच सेवा करतो असा विश्वास आम्हांला वाटतो.

फिरतांना, टीव्ही बघतांना दिसणारी प्रत्येक गोष्ट एकतर तुझी असते किंवा आमची तरी असतेच. तुझे हे बालमन आम्हाला बर्‍याच गोष्टींचे काल्पनिक का होईना पण मालक असण्याचा आनंद देऊन जाते, त्यातील बऱ्याच गोष्टी जोपासण्याचा तर आम्ही स्वप्नांमध्ये सुद्धा विचार करत नाही. तुझ्या बालमनाने आमच्या संपत्तीमध्ये जोडलेल्या गोष्टी आहेत – वाघ, जिराफ, हरण, हत्ती, शार्क, विमाने, ग्रह, आणि अजुन बरंच काही.

तू बोललेला प्रत्येक शब्द आम्हाला देवी स्वरस्वतीच्या शब्दांसारखाच मधुर वाटतो. “बाबा इक्के ये, कम (बाबा इकडे ये)”, आणा पल्ली (आर्ना पडली) ,बनानाआआआआ, चिक्क्क्कुउउउउ, आंबाआआआ, आई बाबूदाना दे (आई साबुदाणा दे), “आई अप्रीकाट दे, पिता दे (पिस्ता)” ,ओ दीदी (ओवी दीदी) आणि तुझ्या बडबडीतील प्रत्येक शब्द. हे सर्व बोलत असतांना तुझे हावभाव, उच्चार, स्वर, चंचलपना आमचा अमूल्य आठवणींचा साठा वाढवत असतात.

ऑफिसमधून घरी पोहचल्या पोहचल्या,मला अपेक्षित असलेली पहिली गोष्ट म्हणजे तुला हसतांना, बडबड करतांना किंवा नाचतांना बघणे, कारण तूला बघताच मला माझी निचरा झालेली ऊर्जा परत मिळते सोबतच आनंद आणि तणावातून मुक्तता मिळते आणि मला इतर कुणापेक्षाही आरोग्यदायी, ताजेतवाने असण्याचा आनंद देते.

लसीकरणानंतर किंवा इतर कुठल्याही कारणाने रडणारी तू जेव्हा शांत होते आणि हसते त्या क्षणी आमच्या जीवात जीव येतो आणि हरवलेला अनमोल खजिना परत मिळल्याचा आनंद आम्हांला मिळतो.

रोज तुझ्या किमान २ तास आधी आम्ही उठतो आणि कमी उमेद आणि उत्साहानेच नित्यनेमाची कामे करतो. तुला उठवायची आम्हाला इच्छा नसते परंतु जोपर्यंत तु उठत नाही आणि तुझा शब्द आम्ही ऐकत नाही, तोपर्यंत कुठलीही गोष्ट करण्यात आमचं मन लागत नाही. तुझा हसरा चेहरा बघण्यास आणि तुझ्या तोंडातून “मम्मा”, “आई”, किंवा क्वचितच एखाद्या दिवशी “बाबा” शब्द ऐकण्यास आम्ही आतुर असतो. हे शब्द आमच्या कानावर येताच, आमचे शरीर लगेच सक्रिय होते आणि उत्साहाने आणि जोमात आम्ही कामाला लागतो, जणू वर्षांपासून आतुरतेने वाट बघत असलेली गोष्टच आम्हांला मिळाली असते. हे आनंद आणि सुखांचे ऐश्वर्य तू रोज आम्हांला देत आहेस.

ह्या सर्व अमूल्य क्षणांची, आनंदाची, मौल्यवान आठवणींची आणि अनमोल, निख्खळ, निरागस हास्याची संपत्ती, दोन वर्षापूर्वी आमच्या घरी जन्म झालेली “धन लक्ष्मी” आमच्यावर रोजच बरसवत आहे.

आमच्यासाठी तर “अष्टलक्ष्मी” च “आर्णा” च्या रूपात आमच्या घरी आणि मनी आली आहे.

दिवसेंदिवस तू मोठी होत आहे आणि सोबतच आमच्या आयुष्यात रोज नवीन नवीन आनंद,मस्ती,आठवणी घेऊन येत आहे. आणि तीच आमची खरी संपत्ती आहे, ज्याची जागा आमच्या आयुष्यात दुसरं काहीही घेऊ शकत नाही. आज तू २ वर्षांची झाली, परंतु या २ वर्षातच तू आम्हाला तुझ्या मस्तीने,कृतीने, चातुर्याने, सामर्थ्याने, बोलण्याने, खळखळून हसण्याने,चेहऱ्यावरील भावाने, निष्पापपणाने, रडण्याने इतके श्रीमंत केले आहे की आता दुसऱ्या कशाचीच अपेक्षा नाही. मला वाटत की तू नेहमीच आमची खेळकर, गोंडस, हसरी लहान परीच रहावे, परंतु वडिलांच्या मनातील भावना या “वेळला” कशा कळणार?. वेळेची ही वास्तविकता स्वीकारून, तुझ्या द्वितीय वाढदिवशी तुला जगातील सर्वच आनंद, सुख, यश मिळावे हीच सदिच्छा आणि वाढदिवसाच्या हार्दिक शुभेच्छा.

जीवेम शरद: शतम.

Media…….

Manmohanji was the PM, Modiji will go, Rahulji will become PM maybe after him Raihan will come to power. But GDP, Economy, China, Employment, Industrialisation are the issues since 1947 and it will remain. Media focuses on Hot bread only and these issues are like side dishes for them which will continue generation after generation. Whenever media don’t have any other TRP topic, they will telecast these things.

Don’t blame Media for ignoring the main issues and showing the SSR, Rhea, Kangana, etc. The day you will stop watching it, the next day the media will change the story of their daily soap drama. Media feeds people with what people want like hot bread only. Finally, they are in business and need high TRP.

Not a single media person came to our home and forcefully pressed the News channel’s number on remote. If you think they are doing shit, stop pressing the news channel’s number on remote and they will automatically change to fruitful things. Else look at it as an entertainment or comedy show.

धोनी………..अनमोल पलो का शायर (हिंदी)

१९९६, ११ साल की उम्र में, मुझे भारतीय क्रिकेट टीम की नीली जर्सी से प्यार हो गया।यह वह समय था जब मैं क्रिकेट और विशेष रूप से भारतीय क्रिकेट टीम का चाहता बन गया। मेरे जीवन की सबसे पहली बड़ी स्पर्धा और पहला बड़ा मैच जो मैंने टीवी पर देखी वो थी विल्स विश्व कप १९९६ में पाकिस्तान के खिलाफ का मैच, जिसमें प्रसाद ने सोहेल की डंडीया उखाड़कर उसके “कह के लूंगा” की धज्जिया उड़ा दियी थी , उस वक़्त मेरा प्यार दोगुना हो गया था। क्रिकेट के प्रति मेरे प्यार की असली वजह मेरे बड़े मौसेरे भाई थे। मेरे भाइयोंने ने मुझे क्रिकेट के बहुत सारे नियम सिखाए, लेकिन भारतीय क्रिकेट का पहला नियम जो मैंने आत्मनिरीक्षण से सीखा, वह था मास्टर ब्लास्टर के बाद होते ही बिना कोई सकारात्मक विचार या अपेक्षा रखे टीवी बंद करना। यदि आप ज्यादा बैचैन हो, तो केवल १% जीत की उम्मीद के साथ मैच का परिणाम पूछ सकते हैं।

यह वो समय था जब भारतीय प्रशंसकों को ९८% विश्वास था कि भारत जिम्बाब्वे, बांग्लादेश, यूएई, केन्या और अन्य कसोटी दर्जा नहीं उन संघो के खिलाफकी मैच में जीत पक्की है। पाकिस्तान के खिलाफ जब मैच होता था तब ४०% जीत का विश्वास, ११०% उम्मीद और १५०% देशभक्ति रहती थी। न्यूजीलैंड, श्रीलंका, इंग्लैंड, वेस्टइंडीज के खिलाफ मैच में ५०% जीत का विश्वास रहता था।वही आत्मविश्वास दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मैच में २५-३०% और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मैच में केवल २-३%, २००% ईर्ष्या और पंचो, ऑस्ट्रेलियाई खिलाडीयो को अनगिनत गाली देना का समय रहता था।

उस समय भारतीय क्रिकेट प्रशंसक ऑस्ट्रेलियाई टीम और खिलाड़ियों से क्रोध और ईर्ष्या करते थे। मैं ऑस्ट्रेलिया को हारते हुआ देखना चाहता था और इस खुशी को अपने आँखों से देखने के लिए, मैं किसी भी टीम के खिलाफ उनका मैच हो, देखता जरूर था। और उन मैचों में,ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज बाद होने का और प्रतिद्वंद्वी द्वारा मारे जाने वाले चौके-छक्कों का जश्न ऐसे मनाता था, मानो मैं उस टीम का प्रशिक्षक हु या मैंने उस टीम पर करोड़ों रुपये का सट्टा लगाया हो।लेकिन ऑस्ट्रेलियाई टीम इतनी संतुलित थी कि उनकी हार को देखना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था।

ऑस्ट्रेलिया की तेज,जबरदस्त और आक्रमक गेंदबाजी का तो कोई तोड़ ही नहीं था, उस तुलनामें भारतीय टीम की गेंदबाजी की ताकत का जिक्र नहीं करना ही ठीक। लेकिन एक खास बात जब भी ऑस्ट्रेलिया हार के कगार पर होता, तो उस हार को जीत में बदलने वाला एक प्रमुख खिलाड़ि था माइकल बेवन, जो उस समय का सर्वश्रेष्ठ फिनिशर था, जबकि भारतीय टीम में ये जिम्मेदारी अजय जडेजा के कंधो पर थी। लेकिन २२ गज की पिच पर, अजय जडेजा फ़िनिशर से बेहतर एक धडाकेबाज बल्लेबाज की भूमिका ही अच्छी निभाते थे। वे उस वक़्त के माइकल बेवन के बल्लेबाजी औसत ५४ के कभी करीब भी नहीं थे।मुझे याद है, जब भी बल्लेबाजी की वजह से ऑस्ट्रेलियाई टीम मुश्किल में आती थी, उन्हें बचाने के लिए बेवन हमेशा ही हाजिर रहते थे, वह नीचे के गेंदबाजों को साथ लेकर और सिर्फ एक-दो रन बना बनाकर मैच जीत लेते थे।इसलिए मैं हमेशा सोचता था कि माइकल बेवनने भारतीय नागरिकता ले लेनी चाहिए या फिर वह किसी दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो जाने चाहिए (हाँ, विनाशकारी ही सही, लेकिन यह मेरे उस वक़्त के विचार थे क्योंकि भारतीय टीम की जीत से ज्यादा कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं था) या शांततपूर्ण मार्ग उन्हें जल्द से जल्द क्रिकेट से संन्यास ले लेना चाहिए।

लेकिन भगवान,समय और भाग्य हमेशा ऑस्ट्रेलिया के साथ ही थे। मुझे विश्वास हो रहा था कि किसीको भी बेवन को रोकने में दिलचस्पी नहीं है  और मैं भी व्यक्तिगत रूप से बेवन की काट नहीं ढूंढ पा रहा था। ये कम था की बेवन के कंधे से कंधा मिलाकर ऑस्ट्रेलिया को और ज्यादा ताकदवर और जीत का दावेदार बनाने के लिए यष्टिरक्षक-बल्लेबाज एडम गिलक्रिस्टने ने ऑस्ट्रेलिया टीम में जगह बनाई और बेवन के साथ साथ वो भी ऑस्ट्रेलियाई टीम के जीत के सूत्रधार बन गए। और हमारे पास थे नयन मोंगिया, एक विशेषज्ञ यष्टिरक्षक और बल्लेबाजी में वह पिच पर आकर गार्ड मार्क करते ही भारतीय टीम के निचले बल्लेबाजों के शुरुवात होती थी। एकदिवसीय मैचों में ८० से अधिक की स्ट्राइक रेट से उनके द्वारा बनाए गए २० से अधिक रन, यष्टिरक्षक-बल्लेबाज द्वारा बनाया गया एक नया भारतीय रिकॉर्ड होता था। भारतीय क्रिकेट में उनका सबसे बड़ा योगदान रहा, १९९८ में शारजाह में मास्टर ब्लास्टर द्वारा खेली गयी दो शतकीय तूफानी पारी में से एक में उनका नॉन स्ट्राइकर बनकर साथ देना और कसोटीमें सलामी बल्लेबाज के रूप में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ बनाये १५२ रन। लेकिन वह मैच फिक्सिंग में पकड़े गए और टीम से बाहर हो गए, तब से भारतीय टीम अच्छा प्रदर्शन कर टीम में अपनी जगह पक्की बनाने वाले एक अच्छे यष्टिरक्षक की तलाश में थी ,जो अगर समय आया तो, एक बल्लेबाज के रूप में गेंद को कैसे रोका जाए ये जानता हो (चूंकि यष्टिरक्षक-बल्लेबाज़ मिलना भारतीय टीम की नियति में ही नहीं था, इसलिए टीम और प्रशसंक एक अच्छा विशेषज्ञ यष्टिरक्षक मिलने पर भी साथ खुश हो जाते)। १९९९-२००४ में भारतीय टीम ने इतने यष्टिरक्षकोका प्रयोग किया की प्रायोजक टी-शर्ट पर नाम या नंबर के बदले “यष्टिरक्षक” ही मुद्रित करवाते थे, ताकि अंतिम समय पर कोई भी उसका उपयोग कर सके। सभी भारतीय यष्टिरक्षक गल्ली क्रिकेट का “सबको बल्लेबाजी मिलनी चाहिए” नियम का सख्ती से पालन कर रहे थे, इसलिए वे पिच पर बहुत अधिक समय बिताना पसंद नहीं करते, जैसे ही वे बल्ला लेकर पिच पर जाते,थोड़ी ही देर में गेंद रंग देखकर और खिलाड़ियों का हाल पूछकर वापस आ जाते। लेकिन मैं भाग्यशाली था, क्योंकि समीर दीघे ने २००१ में वेस्टइंडीज के खिलाफ स्पर्धा के अंतिम एकदिवसीय मैच में बनाये ९४ रन और २००२ में अजय रात्रा ने वेस्टइंडीज के खिलाफ ही कसोटी मैच में बनाये ११२ रन जो कसोटी क्रिकेट में विदेशी धरती पर भारतीय यष्टिरक्षक ने बनाया पहला शतक था, इन दोनों परियो को मैंने अपने आँखोंसे देखा। इन दोनों पारियो को देख मैं और भारतीय प्रशंसक इतने खुश हो गए की आसमान भी छोटा पड़ने लगा और लगने लगा की अब जीवन में देखने के लिए कुछ नहीं बचा है। (क्षमा, यदि मैं उस समय किसीभी भारतीय यष्टिरक्षक द्वारा खेली गयी कोई महत्वपूर्ण पारी भूला हु तो)। पार्थिव पटेल, १६ वर्षीय लड़का इस सबमे थोड़ा अपवाद था। वह यष्टिरक्षन के साथ साथ बल्लेबाजी भी अच्छी करता था। हालाँकि, भारतीय टीम “द वाल” के सामने ही आकर थम गयी और आखिरकार द वॉल ने गेंद को विकेट के दोनों ओर रोकने की जिम्मेदारी अपने कंधे पर ले ली । ऑस्ट्रेलिया के लिए, गिल्ली सलामी बल्लेबाज के रूप में गेंदबाजों का करियर खराब कर रहा था, जबकि विकेट के पीछे उसकी चपलता और प्रदर्शन के आस पास भी कोई नहीं था (संगकारा एक विशेषज्ञ बल्लेबाज बन गए थे और बाउचर बल्लेबाजी में इतने भी विश्वसनीय नहीं थे)। गिली उस समय विश्व क्रिकेट में सर्वश्रेष्ठ यष्टिरक्षक-बल्लेबाज थे। इसलिए मै बेवन के बारे में जो भी अच्छा या बुरा सोचता था, अब गिली का भी नाम उनके साथ जुड़ गया था।
कप्तानी हमेशा ही ऑस्ट्रेलिया का सबसे मजबूत पक्ष या ताकत रही है, टेलर-वॉ-पोंटिंग-क्लार्क-स्मिथ ने ऑस्ट्रेलिया के एक के बाद एक श्रृंखला जीतने के रथ को दौड़ते रखा, और क्यों नहीं रखे? जब आपकी टीम में यष्टिरक्षक-बल्लेबाज गिली और मैच जीतकर ही पिच से हटने वाला बेवन हो तो आपकी टीम के लिए जीत सिर्फ समय की बात है।
मैं हमेशासे मानना थी की भारतीय टीम में गिली जैसा यष्टिरक्षक-बल्लेबाज, बेवन जैसा मैच ख़त्म करके ही रुकने वाला बल्लेबाज और स्टीव वॉ जैसा कप्तान होना जरुरी है। ये तीन खिलाड़ि ही भारतीय क्रिकेट टीम और प्रशंसकको जीत की आदत लगा सकते है। भारतीय क्रिकेट टीम के चयनकर्ता भी ऐसेही खास और महत्वपूर्ण ३ खिलाड़ि एक अच्छा मैच जीत में ख़त्म करनेवाला, एक अच्छा यष्टिरक्षक-बल्लेबाज और एक अच्छे कप्तान की तलाश में थे। १९९९ में कप्तान के रूप में दादा और चौथे नंबर पर बल्लेबाजी के लिए आने वाले युवराज ने भारतीय प्रशंसकों की आदतों को थोड़ा बदल दिया था और उम्मीद बढ़ा दिए थी। लेकिन टीम अभी भी मैच को अंत तक ले जाने वाले बल्लेबाज और अच्छे यष्टिरक्षक की प्रतीक्षा कर रही थी, लेकिन प्रशंसक अभीभी “ये दिल मांगे मोर” का ही गाना गा रहे थे।  

“आंधळा मागतो एक डोळा देव देतो दोन डोळे” (अंधा एक आँख मांगता है और भगवान दो देता है) मानो यही साबित करने के लिए धोनी ने बांग्लादेश के खिलाफ भारतीय टीम में पदार्पन किया। धोनी और विकेटकीपर-बल्लेबाज की प्रतीक्षा कर रहे भारतीय प्रशंसकों के लिए यह पदार्पन दिल तोड़ने वाला ही थी। धोनी ने पहले तीन मैचों में केवल १९ रन बनाए और मुझे पार्थिव पटेल की टीम में वापसी के सपने आने लगे।लेकिन भारतीय क्रिकेट के अंधेरे भविष्य में, धोनी नामका सूरज तेज उजाला लाने वाला था। और फिर आयी पाकिस्तान के खिलाफ का वो मैच आया जब धोनीने १२३ गेंदों पर १४८ रन बनाकर, पाकिस्तानी गेंदबाज और क्षेत्ररक्षकको परेशान कर के रख दिया।इसके बावजूद विशेषज्ञों ने पाया कि धोनी की बल्लेबाजी और यष्टिरक्षण इतना तकनिकी नहीं है और उसमे खामियां है। लेकिन जब तक खिलाड़ी टीम के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता हैं और टीम जीतती है, तब तक भारतीय प्रशंसक और मैं खिलाडी के तकनीक की बिलकुलही परवाह नहीं करते। (मांजरेकर, कांबली जैसे तकनिकी और प्रशिक्षित खिलाड़ियों का टीमके जीत में योगदान हमेशा चर्चा का विषय रहा है)। धोनी ने अपनी बल्लेबाजी और यष्टिरक्षण के दम पर टीम में पहले स्थान हासिल कर पक्का किया, फिर धीरे-धीरे मैच-विजेता और मैच-ख़त्म करने जैसी विभिन्न भूमिकाओं के अनुरूप अपनी बल्लेबाजी शैली को बदल दिया। और जब उन्होंने कप्तानी संभाली, तबी से तो भारतीय क्रिकेट का चेहराही बदलने लगा।
“नसीब हमेशा वीरो का साथ देता है” लेकिन कुछ ही वर्षों में एक बहादुर, निडर, शांतचित्त और विचारवान वीर ने भारतीय क्रिकेट की किस्मत और नसीब को ही बदल दीया। उन्होंने यह सब किया अपनी मैच अंत तक ले जाकर ख़त्म करने की, विकेट में तेजी से दौड़ने की, विकेट के पीछे तेजी से और सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के की, टीम के लिए किसी भी क्रम में बल्लेबाजी करने के लिए तैयार रहने की, परिस्थिति और जरूरत के हिसाब से बल्लेबाजी की शैली में बदलाव करनेकी, सबसे खास टीम को मजबूत और  एकजुट रखनेकी, उत्साहित करने की, भावनाओं में बहकर न जाते हुए स्थिर और शांत मन से नेतृत्व करने की और विरोधियों को हमेशा चौंकाने वाले आश्चर्य में डालकर जाल में फ़साने की अपनी महान क्षमतोसे।
“आखिरी गेंद फेंके जाने तक मैच सुरु ही रहता है” वास्तव में इसपर विश्वास रखनेवाला और निष्पादित करने वाला खिलाड़ी, मास्टर ब्लास्टर विकेट जल्दी गिराने के बाद भी हम जीत सकते हैं,इस उम्मीद में प्रशंसकों मैच देखने पर मजबूर करनेवाला खिलाडी, छक्के के साथ मैच ख़त्म करना जिसे पसंद और शौक था ऐसा खिलाड़ी,जो किसीभी और किसकीभी गेंद पर अपनी ताकत से आसानी से छक्का लगाता था ऐसा खिलाडी, क्रिकेट और मैच की स्थिति को अच्छी तरह पढ़ना जिसे बखूबी आता था ऐसा खिलाडी, २०११ विश्व कप अंतिम मैच में लय में चल रहे युवराज की जगह पांचवें स्थान पर बल्लेबाजी करने का आत्मविश्वास दिखाकर इतिहास बनानेवाला खिलाडी। २००७ के २०-२० विश्व कप फाइनल में भज्जी द्वारा अंतिम ओवर में गेंदबाजी करने से इनकार शांत दिमाग और मन से जोगिंदर से अंतिम ओवर करवाकर विश्व कप जीतने वाले युवा, अनुभवहीन और निर्विवाद कप्तान ऐसा खिलाडी । विरोधी टीम के विचारों और खेल को पढ़ने की क्षमता रखनेवला और उसी के अनुसार त्वरित योजना बनानेवाला कप्तान और खिलाडी। नए खिलाड़ियों को मौका देनेवाला, युवा खिलाड़ी और खिलाड़ियों की क्षमता पर विश्वास करनेवाला, खिलाड़ियों को उत्साहित कर उनका हौसला और विश्वास बढ़ानेवाला, खिलाड़ियों को अपना खेल दिखने का पर्याप्त अवसर देनेवाला कप्तान।दुनिया के सबसे तेज यष्टिरक्षक, उनके करियर में कुल १९५ यष्टिचित विकेट, जो दूसरे स्थान पर (१३९) यष्टिरक्षक से ४०% अधिक है, इससे साबित होता है कि विकेट के पीछे वह कितने तेज थे।

कौन उसे पसंद या नापसंद करता है, टीम के अन्य खिलाड़ियों के प्रति उसका क्या नजरिया है, वह उनके साथ कैसा व्यवहार करता है, उसने पुराने खिलाड़ियों के साथ क्या किया, एक व्यक्ति के रूप में वह कैसा है, उसने कब संन्यास लेना चाहिए था, आदि सभी बातों से भारतीय प्रशंसकों को कोई फर्क नहीं पड़ता है। क्योंकि प्रशंसकको के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत ने आईसीसी विश्व कप २०११ जीता, २००७ आईसीसी २०-२० विश्व कप जीता, भारतीय टीम ने पहली बार आईसीसी टेस्ट रैंकिंग में शीर्ष स्थान हासिल किया, आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी में जीत हासिल कियी, ऑस्ट्रेलिया में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ ३ में से बेहतर शैली के अंतिम मैचोवाली कॉमनवेल्थ बैंक कप जीता और ये सब मुकाम भारतीय टीम ने हासिल किया दुनिया के सबसे अच्छे मैच जीत में खत्म करने की क्षमतावाले यष्टिरक्षक-बल्लेबाज कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के नेतृत्व में। जिसने भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों को जीतने की आदत लगायी और भारतभी ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मैच जीत सकता है यह आत्मविश्वास ३% से बढाकर ८०% किया।
अपने खास अंदाज में मैच का ख़त्म करने वाले धोनी ने अंतरराष्ट्रीय करियर से चुपचाप संन्यास ले लिया।
किसी भी बुरी घटना के बारे में हमेशा कुछ न कुछ सकारात्मक होता ही है। धोनी के संन्यास के बारे में सकारात्मक बात यह है कि प्रशिक्षक के रूप में रवि शास्त्री की जगह लेने के लिए बीसीसीआई के पास अब दो सबसे अच्छे विकल्प हैं। पहले बेशक और निर्विवाद “द वॉल” है, जिस तरह से उन्होंने युवा क्रिकेट टीम के खेल और रंग को बदल दिया है इसके बाद उन्हें किसीभी अन्य तरीके से अपनी क्षमता साबित करने की आवश्यकता नहीं है। और अन्य व्यक्ति, जो जानता है कि थोड़े उम्रदराज, थके हुए, खोए हुए और गैर निष्पादित खिलाड़ियों के साथ भी मैच कैसे जीता जाता है ऐसे एमएस धोनी। आईपीएल में चेन्नई के लिए वह हमेशा उम्रदराज, अन्य टीमों द्वारा अनुबंध से निकाले गए  और अच्छा प्रदर्शन न करने वाले अच्छे खिलाड़ियों को ही खरीदते है (वॉटसन, बद्रीनाथ, मैकुलम, मॉरिस, पीयूष चावला, मोहित शर्मा, बालाजी, रायुडू, जाधव, ताहिर, भज्जी, ड्वेन स्मिथ, हेडन, एल्बी मोर्कल इसके कुछ उदाहरण हैं)। लेकिन जैसे ही वह सीएसके की पीली टी-शर्ट पहनकर धोनी नेतृत्व कर रहे चेन्नई के टीम में सवार हो जाते है, वैसे ही उन्हें कौन सी ऊर्जा और लय मिलती है ईश्वरही जानता है, क्योंकि तब वह इतना असाधारण, अविश्वसनीय प्रदर्शन करते है कि वह उनके करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन बन जाता है। तो चलिए “उम्मीद पे दुनिया कायम है” कहते हुए आशा करते हैं और उम्मीद रखते हैं कि हम जल्द ही धोनी को एक नई भूमिका में देखेंगे और तब तक, आईपीएल जिंदाबाद कहकर उनके खेल का आनंद लेते रहेंगे।

कर्णधार, खिलाड़ी और उसके खेल के लिए कुछ पंक्तियाँ, अंतिम लेकिन आखरी नहींपल दो पल के शायरकी, क्या खूब थी वो शायरी जो अमर हुयी, पल दो पल ही तेरी कहानी थी,लेकिन याद है जीती वो जंगे जो तूने है खूब लड़ी,
पल दो पल ही तेरी हस्ती थी, जो हर पल लोगो के दिल में है बसती,
पल दो पल ही तेरी जवानी थी,वो जवानी ही अब जवानो को दीवाना है करती………..

पल दो पल की ये अनमोल कहानी, जिसका नाम महेंद्रसिंह धोनी।  

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