बरसात और मैं….भाग १ – बैर

बारिश. मुझे बारिश पसंद होने के कई कारण हैं, लेकिन बारिश ने जरुरत के समय कभी मेरा साथ नहीं दिया। यही एकमात्र मुख्य कारण है जिसकी वजहसे मुझे बारिश पसंद नही। यही वजह है की मेरी और बारिश की कभी नहीं बनी। ऐसा भी नहीं की मेरी बहुत बड़ी बड़ी उम्मीदे थी। लेकिन अगर कोई अच्छा काम करने का या किसीका भविष्य बनाने का ठान लेता है, तो वो मेरी क्यों सुनेगा?

मां, हमे सुबह ५.३० बजे जगाती थी। आँखें खोलते ही, पता चलता की यह सज्जन कल रात से ही जोर शोरसे बरस रहे हैं। यह देख, मेरे मन की नदीमे खुशी के बाढ आ जाती थी। “मुझे नहीं लगता आज दिनभर बारिश रुकेगी”, यह कहकर आज स्कुल से छुट्टी करने का सुझाव माँ को दूंगा, तभी माँ छाता निकालते हुए और अन्ना किताबे पॉलीथीन की बॅग में डालते हुई दिखाई देते। उन दोनों की यह जय्यत तैयारी देख मेरे खुशी की बाढ़ मे थोडा उतार आता।लेकिन “उम्मीद पे दुनिया टिकी है” सोचते हुए मन को धैर्य रखने के लिए कहता। भले ही माँ, अन्ना और छाता मुझे स्कुल भेजने का ठानकर विपक्ष में चले गए हों, लेकिन यह स्पष्ट था कि बारिश ने मेरे साथ मजबूत गठबंधन किया है। क्योंकि हम छात्र थे जिन्होंने “येरे येरे पावसा” गीत गाकर बारिश को आने के लिए मनाया था।

भले ही यह त्रिकुट, चादर में सोते रहकर बारिश के मजे लेने की मेरी योजना को विफल रहे थे। लेकिन दिल और दिमाग मे पक्का था की मेरी दोस्त आज स्कुल से छुट्टी जरूर करवायेगा। दुखी मन से ही मैं उठता था, बिस्तर से नीचे उतरकर प्रात:विधिया जल्दी जल्दी निपटा लेता था। मेरी दोस्त बारिश मजे से बाहर बरसते हुए मेरी उम्मीद जगाये हुये थी। मेरी दोस्त का मेरे प्रति लगाव देखकर मुझे जय-वीरू की दोस्ती याद आती थी। मेरे खुशी की बाढ़ मे फिर तेजी आ जाती। “स्कुल जाना ही नही तो तयार क्यू होना?” ये सवाल अपने मुंह से निकालने की कोशिश करता। लेकिन माँ-अन्ना की मुझे स्कुल भेजने कि भागदौड, उनके चेहरे या माँ के हाथों मे बेलन देख, वो सवाल बाहर आने की हिम्मत नही जोड पाता। स्कुल के कपड़े पहनकर,किताबें-नोटबुक बस्ते मे डालकर,सबकुछ ठीकठाक कर, तैयार होकर समय से ३० मिनिट पहले ही माँ के सामने चाय-ब्रेड के लिये हाजिर था। माँ ने चाय-ब्रेड से पहले हाथ में लंच बॉक्स थमा दिया था। लंच बॉक्स देखकर, मैं सोचने लगता था,माँ सुबह जल्दी उठकर हमारे लिए कितनी तकलीफ उठाती है। साथ ही ये भी ख्याल आता कि अगर आज लंचबॉक्स नहीं बनाया होता तो भी चलता, क्योंकि बहुत बारिश हो रही है स्कुल जाना मुश्किल है यह सोचकर मैं मन ही मन में “आनंदी-आनंदगडे इकडे तिकडे चोहीकडे (ख़ुशी ही ख़ुशी है इधर-उधर चारो तरफ)” ये कविता गुनगुनाने लगता। बाहर बारिश तेज हो गयी थी।अब यह स्पष्ट दिख रहा था कि अगले ३-४ घंटे ये महोदया छुट्टी लेनेवाली नही। यह देख, मेरे मन के ख़ुशी की बाढ़, मेरे नकारात्मक सोच को अपने साथ ले गई थी। फिर भी “स्कूल से आज दांडी” यह शब्द मेरे मुहंसे बाहर आने को तैयार नहीं थे। मैंने लंचबॉक्स को बस्ते में रख दिया। मेरी दोस्त बाहर संयम के साथ बरस रही थी और उसी संयम के साथ माँ अन्ना, मेरे छुट्टी के विचार की छुट्टी करने की तयारी कर रहे थे। आखिरकार माँ ने चाय को कप में डाला और चाय के साथ ब्रेड की प्लेट मेरे तरफ खिसकाकर, मेरी घरसे स्कूल जाने की आखिरी घंटी बजाई। इस महोदया का बाहर तांडव अभी भी चल रहा था, यह देख मेरा दिल भी नाच रहा था।

ऐसे बरसात में कोई नासमझ अरसिक ही गरम गरम चाय के लिये नहीं कहेगा। आगे का आगे देखेंगे यह मन को समझाकर ब्रेड को नकार देते हुए (स्कुल जाना ही नही, तो नाश्ता क्यु करना ! थोड़ी देर बाद माँ को मस्त गरम गरम पकोडे बनाने को कहुंगा। इन विचारों की नाव धीरे-धीरे मेरे मन की बाढ़ में झूल रही थी) मै चाय का कप अंतिम लक्ष्य तक पहुँचा रहा था। गरम गरम अमृततुल्य का आनंद लेते हुये, आज तो छुट्टी पक्की है इसी कपोलकल्पना में डुबा हुआ था। “बारिश बहुत है छाता होकर भी कपड़े गिले हो जायेंगे, गिले कपडो की वजहसे सर्दी खासी हो सकती है, चप्पल कीचड़ में फंसकर तुटने की संभावना ज्यादा हैं, बस्ते में पानी जाकर किताबें गिली होकर फट सकती हैं,स्कुल के सामने बहुत कीचड़ होता है उस वजहसे कपड़े खराब होते है” चाय खत्म होते ही इस तरह की बारिश विरोधी वित्तीय, मानसिक और शारीरिक क्षति की दलीलो की आधारपर, छुट्टी को एक कायदे से लियी गयी माता-पिता की मान्यता प्राप्त छुट्टी में परिवर्तित करने की सोच रहा था।

लेकिन वह पल आ ही गया जब बारिश और मेरी दोस्ती दुश्मनी में बदल गयी। रोज स्कुल जाने के समय के बराबर  ५ मिनट और मै चाय का कप खाली कर नीचे रखने से पहले, मुझे एहसास हुआ कि बारिश धीरे-धीरे आसमान में खोती जा रही है।मुझे कुछ समझने से पहले ही वो आसमान में कही गायब हो गयी और बादल भी छटकर आसमान एकदम साफ हो गया है। जैसे की ५-६ दिनोसे बारिश हुई ना हो और आगे भी नहीं होगी।

मुझे ये समझने में देर नहीं लगी कि मेरी दोस्त ने भी शोले की जय की तरह मेरा साथ बीच में ही छोड दिया है।जोश जोश में ब्रेड खाने से मना करने का बोझ दिल से ज्यादा पेटपर देकर, बस्ते का बोझ अपनी पीठ पर ढोकर और छाते को दुखी मन का सहारा बनाकर मै स्कुल की ओर कूच करता। घर के आंगन से आखरी बार भीख माँगते हुए नजरोसे आसमान की ओर देखते हुए, मैं भारी मन से स्कुल के लिये निकल जाता।१५ मिनट की पदयात्रा मुझे १५ साल की तरह लग रही थी। इन १५ मिनटों में जुदाई, याद,दिलबर को बुलाने जैसे न जाने कितने  गाने गाकर बारिश महोदया को आने की मिन्नते करते रहता। लेकिन वह जय इस वीरू की बात सुनने को तैयार ही नहीं था।

अंत में उपायो के सारे हथियार और छुट्टी की उम्मीद छोड प्रार्थना के समय से पहले मैं स्कुल पहुंचता। दुखी और नाराज मन से ही प्रार्थना की पंक्ती मे खडा होकर प्रार्थना कम और बारिश को कोसना ही सुरु रहता। साथ ही अब हम क्रिकेट खेलते वक्त आयी, तो याद रखना ऐसी धमकी भी दियी जाती। (पक्की सडक पे बनी हमारी क्रिकेट पिच और प्लास्टिक की गेंद गिली होकर खेल ना होने का कोई खतरा नहीं था। उपरसें पिच के आसपास जो पानी भरा होता उससे क्षेत्ररक्षको तैरने की सीख आसनी से मिलती थी)।

प्रार्थना खत्म होते होते आसमान मे काले बादल फिर से घिरने शुरु हो गये और मुझे छोटीसी ही लेकिन उम्मीद की किरण नज़र आने लगी। प्रार्थना खत्म भी हो गई, लेकिन वह अनुपस्थित की अनुपस्थित। पहली बार मैं एक अनुशासित बच्चे कि तरह बराबर पंक्ती मे और कछुवा भी मुझसे जीत जाये ऐसी गती से कक्षा के और जा रहा था।लेकिन बारिश महारानी बरसकर मुझपे कृपा करने को तयार ही नही थी। जिस गती से मैं कक्षा में जा रहा था, उसी गती से आसमान मे बादल छा रहे थे। कछुवा, मै और बादल जैसे हारने के लिये दौड रहे हो और बादल मुझे जिताने मे ही लगा था। शायद बादल बरसने के लिये मेरे कक्षा में पोहचने का ही इंतजार कर थे।

मैं कक्षा के दरवाजे तक पहुँचने से पहले मेरे सभी दांव आजमा चुका होता, हर कोशिश कर चुका होता और आखिरकार भगवान का नाम लेकर हथियार डाल देता।अब कुछ नही हो सकता खेल खत्म कहते हुए, बादलो की तरफ आँखे दिखाकर देख लुंगा, सबक जरूर सिखाऊंगा कहने के लिये बडी बडी आँखे कर जैसे ही चेहरा बाहर निकालता बारिश कि उतनी ही बडी बडी बुंदे, मै बादलो को देखने से पहले ही मुझे आँखें बंद करने के लिए मजबूर कर देती। तब तो मेरे गुस्से कि कोई सीमा ही नही रहती।

अब तो इसे आँखें दिखाकर घुस्सा करता ही हुं, कहकर जैसे ही मैंने चेहरा बाहर निकालकर देखा, तो बारिश महोदया मेरी ओर ही देखकर मुझे चिढा रही हो ऐसे लग रहा था। जैसे मुझे देखकर हंसते हुए कह रही हो “ले बेटा,मुझे जोर से बरसने कहकर खोटा सिक्का देता है (ये रे ये रे पावसा तुला देतो पैसा, पैसा झाला खोटा, पाऊस आला मोठ्ठा)। अब मैं पूरे दिन बरसुंगी, तु बैठ स्कुल मे पढते हुए और तेरा क्रिकेट खेलना भी गया पानी में”। तब मुझे ऐसा लगता था की मेरा और शोले के वीरू दोनो के साथ दगा या विश्वासघात नकली पैसे ने ही किया है।फर्क सिर्फ इतना था शोले में जय ने सिर्फ एक बार दगा किया था, लेकिन जब जब भी मैंने बारिश के वजहसे छुट्टी/दांडी के बारे में सोचा तब तब बारिश हमेशा ही मेरा विश्वासघात किया है।

रातभर-दिनभर जोर से बारिश, लेकिन जब स्कूल जाने का समय होगा,बराबर उसी समय यह महोदया चाय,नाश्ता,खानेका या फिर लघुशंका जाने के लिये विराम लेती। जैसे इसे हमारे स्कुल जाने का सटीक समय पता हो। बारिश के वजहसे स्कुल को छुट्टी ये मेरी एक कल्पना ही रह गयी। बचपन मे के हुए संस्कार और दिमाग में डाले गए विचार,आसानी से बदले नहीं जाते। विशेष:कर बारिश ने तुम्हारी छुट्टी की सोचपर, ऐन मौके पर विरोध कर पानी फेरा हो, तो बच्चे के दिमाग पर पडे प्रभाव को बदलना संभव ही नहीं है। इसलिए शुरूवाती कुछ अनुभव के बादही हमारी जय-वीरू की जोड़ी, ठाकुर-गब्बर की जोडी बन गई।और वो अभी भी वैसेही हैं (कौन ठाकुर और कौन गब्बर ये अलग चर्चा का विषय है)।

पाऊस आणि मी…….भाग १ – वैर

पाऊस, मला पाऊस आवडायचे बरीच कारणे असले तरी मला पाऊस न आवडायच एकच मुख्य आणि मोठ कारण आहे. त्यामुळे माझं आणि पावसाच कधीच पटल नाही. ते कारण म्हणजे पावसानी, मला हवी तेव्हा कधीच साथ दिली नाही. बर माझ्या खूप अपेक्षा होत्या अस पण नाही. परंतु जर एखाद्यानी चांगल काम करायच किंवा भविष्य घडवायच ठरवलंच असेल, तर तो आमच्यासारख्याच का म्हणून ऐकणार!

सकाळी ५.३० ला आई आम्हाला उठवायची, डोळे उघडताच कळायच हे महाशय रात्री पासून बाहेर ठाण मांडून धो-धो करत आहेत. बाहेर धो धो करणारा पाऊस बघून आमच्याही मनाची नदी आनंदाने ओथंबून वाहायची. आज पाऊस काही थांबणार नाही वाटते! म्हणत आज शाळेला दांडी अस आईला सुचवणार तोच आई छत्री बाहेर काढून ठेवताना आणि अण्णा वही-पुस्तक वगैरे पॉलीथीन मध्ये टाकताना दिसायचे.ही सर्व जय्यत तयारी बघून मनातील आनंदाचा पूर थोडा कमी व्हायचा पण “उम्मीद पे दुनिया कायम है” म्हणत मनाला धीर धरायला सांगायचो. आई,अण्णा आणि छत्री जरी विरोधी पक्षात गेले असले, तरी पावसानी आपल्या सोबत पक्की युती केली आहे अस आभाळाकडे बघून मनात नक्की वाटायच. कारण शेवटी “येरे येरे पावसा” हे गाणे म्हणत त्याला येण्याची विनवणी करणारे आम्ही विद्यार्थीच होतो.

त्यामुळे चादरेमध्ये झोपून पावसाचा आस्वाद घेण्याचा कट जरी त्रिकुटाने अयशस्वी केला असला तरी आपला मित्र शाळेला दांडी बसवणारच अस मनात नक्की वाटायच.मन मारूनच झोपेतून उठत, पलंगावरून खाली उतरून प्रातःविधी निपटवायचो. हा महाशय बाहेर धो धो करत दोस्ती निभावत उभाच! मला एकदम जय-वीरूची मैत्री आठवायची. आनंदाच्या पुराला पुन्हा जोर चढायचा. शाळेला जायचचं नाही मनात पक्के असल्यामुळे तयारी का हा प्रश्न मनात उसळी घेत तोंडावाटे बाहेर पडायचा प्रयत्न करायचा, पण आई-अण्णाची धावपळ, चेहरा किंवा हातामधील बेलणे त्या प्रश्नाला मनातच बांध लावायचे. शाळेचे कपडे घालून,पाटी,पुस्तक,वही,दप्तर सर्व काही व्यवस्थित करून वेळेच्या ३० मिनिट आधीच तयार होऊन चहा-पाव खायला आई समोर हजर.चहा-पाव देण्याआधी आई हातात जेवणाचा डब्बा द्यायची. मनात आई बद्दल कीव यायची कि सकाळी उठून आपल्या साठी किती धावपळ करते आणि सोबत हे पण वाटायच की आज नसता केला डब्बा तरी चालल असतं, कारण आज पाऊस खुप आहे, शाळेला जाणंच शक्य नाही म्हणत “आनंदी-आनंदगडे इकडे तिकडे चोहीकडे” असे मनाचे श्लोक चालायचे. पाऊस महाशय जोर वाढवत होते. आता तर साफ दिसत होत कि पुढचे ३-४ घंटे काही हे महाशय सुट्टी घेणार नाहीत. मनातला पूर दुःखाची मरगळ सोबत घेऊन गेला असला तरी शाळेला दांडीचे शब्द बाहेर येई ना. डब्बा दप्तरात टाकला, दोस्त बाहेर संयमाने बरसतच होता आणि आई अण्णा तितक्याच संयमाने माझ्या दांडीच्या विचाराची दांडी उडवत होते. शेवटी आईने कपमध्ये चहा गाळला आणि पाव प्लेट मध्ये ठेऊन माझी शाळेला जाण्याची शेवटची घंटी वाजवली. ह्या बाबाचा बाहेर तांडव अजून पण जोरात सुरुच होता आणि हे बघून माझ्या मनात आनंदाच्या उकळ्या येत होत्या.

अशा पावसामध्ये गरम गरम चहाला कुणी अरसिकच नको म्हणेल. म्हणून पुढचं पुढे बघू हा विचार नक्की करत पावला नकार देत (घरीच थांबायच तर नाश्ता कशाला!, थोड्या वेळानी मस्त भजी करायला सांगू. या विचारांची होडी माझा मनातील पुरामध्ये संथपणे हिंदोळे घेत होती) चहाच्या कपाला त्याच्या अंतिम ध्येयापर्यंत पोहचवत आणि दांडी होणारच या कपोलकल्पनेत गरम गरम अमृततुल्याचा आस्वाद घेत विचार करत होतो, चहा संपला कि आपण आई-अण्णाच्या  न्यायालयात पावसाविरोधातील छत्री असली तरी कपडे ओले होतात, ओले कपडे राहिले तर सर्दी होऊ शकते, चप्पल चिखलामध्ये फसून तुटू शकते, पुस्तक पण ओले होऊन फाटू शकतात, शाळेसमोर चिखल असतो त्यानी कपडे खराब होतात, शाळा गळते वगैरे आर्थिक, मानसिक, शारीरिक नुकसानीच्या दलील देऊन दांडीला स्वीकृत सुट्टीमध्ये बदलायच.

परंतु तो क्षण आला जेव्हा पावसाच्या आणि माझा वैरीची सुरुवात झाली. दररोज शाळेला जायच्या बरोबर  ५ मिनिट आधी आणि मी अमृततुल्याचा एकच प्याला रिक्त करून खाली ठेवण्याआधी पाऊस महाशय आकाशात हळू हळू  कुठे गडप झाले कळलं पण नाही आणि आभाळ अस मोकळ झाले जस की ५-६ दिवस पाऊस आलाच नाही आणि पुढे येणार पण नाही.

मित्रांनी, आपली शोले मधील जयसारखी साथ सोडली हे कळायला वेळ लागायचा नाही. पावला उगाच नकार दिला, याचा भार मनापेक्षा पोटावर जास्त घेत, दप्तराचे ओझे पाठीवर टाकत, दु:खी मनाला आधार म्हणून छत्रीची काठीकरून घराबाहेर पाऊल टाकत शाळेकडे कूच करायचो. अंगणातून एकवार अखेरची विनवणी करणारी नजर आभाळाकडे टाकत जड अंतःकरणानं शाळेला निघायचो. १५ मिनिटांची पदयात्रा १५ वर्षांची वाटायची. या १५ मिनिटांमध्ये विरहाचे आणि वाट बघण्याचे किती तरी गीत म्हणत विनवण्या चालायच्या. पण तो जय काही वीरुचं ऐकत नव्हता.

सरतेशेवटी शस्त्र आणि दांडीची अपेक्षा टाकून शाळेत प्रार्थनेवेळे आधी पोहचायचो. मन मारतच प्रार्थना व्हायची.प्रार्थना कमी आणि पावसाला शिव्यांची लाखोली जास्त वाहली जायची आणि सोबतच आता क्रिकेटचा सामना संपण्याआधी आला तर लक्षात ठेव अशी धमकी दिल्या जायची.(आमच्या डांबरी पिच आणि प्लास्टिक बॉलला पाऊसाचा काहीच फरक पडत नव्हता. आजूबाजुला साचलेल्या पाण्यामुळे क्षेत्ररक्षकाला पोहण्याचे धडे मिळायचे ते वेगळं)

पण प्रार्थना संपायच्या आधी पुन्हा आभाळात ढग दाटून यायचे. पुन्हा मनात आशेचा खूप छोटासाच पण अंकुर यायचा. प्रार्थना संपली तरी हा गैरहजरच, कधी नव्हे तो मी शिस्तीने रांगेत गोगलगाय पण लाजेल इतक्या हळू गतीनी वर्गाकडे निघायचो. परंतु पाऊस महाशय कृपा करतील तर खरं. ज्या गतीने मी वर्गाकडे निघायचो त्याच गतीने आभाळ काळवटने सुरु असायच. जणू मी वर्गात पोहचण्याचीच हा बरसण्यासाठी वाट बघत आहे.

मी वर्गाच्या दारात पोहचेपर्यंत सर्व शर्थीचे प्रयत्न आणि देवाचा धावा करून शस्त्र खाली टाकलेले असायचे. आता संपला सर्व खेळ अस म्हणत, शेवटी आभाळाकडे बघत पावसा बघून घेईल तुला असे डोळे दाखवण्यासाठी चेहरा बाहेर काढायचो तेच टपोरे थेंब माझ्या चेहऱ्याचे स्वागत करायला तयारच होते, मी डोळे दाखवण्या आधीच ते थेंब मला डोळे बंद करायला भाग पाडायचे. मग तर माझा रागाला पारावार नसायचा.

आता तर याला डोळे दाखवतोच म्हणत चेहरा बाहेर काढून बघणार, तर पाऊस महाशय माझ्याकडेच बघत मला वाकुल्या दाखवत “घेणं बाबू, मला ये रे ये रे पावसा म्हणत खोटा पैसा देतो न. आता बस दिवसभर शाळेत शिकत आणि तुझा क्रिकेटचा सामना पण मी वाहून नेतो बघच तू” असा म्हणत हसत आहे अस वाटायच. तेव्हा वाटायच की माझा आणि शोलेच्या वीरू दोघांचा ही घात खोट्या पैसानीच केला.फरक फक्त इतका होता की शोलेच्या जय नी एकच वेळ दगा दिला आणि मला पाऊस,नेहमीच जेव्हा जेव्हा मी दांडीचा विचार करायचो तेव्हा तेव्हा याप्रकारे दगा द्यायचा.रात्रभर आणि दिवसभर पाऊस, पण बरोबर शाळेला निघायचा वेळ झाला की या महाशयाची चहाची, जेवायची, सु-शीची विश्रांती नक्कीच व्हायची, त्यामुळे पावसामुळे शाळेला दांडी ही माझी एक कल्पनाच राहली. त्यामुळे बालपणी मनावर बिंबले गेलेले विचार लवकर जात नाहीत त्यात विशेषकरून जर पावसानी दांडी साठी सतत केलेला विरोध असेल तर बालमनावरील परिणाम बदलणे शक्यच नाही.म्हणूच सुरुवातीच्या काही अनुभवानंतरच आमची जय-वीरूची जोडी ठाकूर-गब्बर मध्ये रूपांतरित झाली. आणि ती अजूनही तशीच आहे (ठाकूर कोण आणि गब्बर कोण हा चर्चेचा विषय आहे!).

Rasbhari – hindi web series review in hindi रसभरी- हिंदी समीक्षा

रसभरी,३० मिनट की औसत लंबाईवाले ८ भागोकी हिंदी वेब सिरीज जून २०२० में अमेझान प्राइम पर प्रदर्शित हुयी है। रहस्य-रोमांस-प्रेम-नाटक शैली पर आधारित कहानी के साथ दर्शकों का मनोरंजन का किया गया एक असफल प्रयास।

मुख्य कहानी दो किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है। पहला स्वरा भास्कर द्वारा निभाई गई दोहरी भूमिका शिक्षिका शानू बंसल और वेश्या रसभरी का किरदार है । इन दोनों भूमिकाओं में अभिनय बहुत सामान्य है। उनकी पिछली भूमिकाओं के साथ बिल्कुलही तुलनात्मक नहीं है। दूसरा किरदार नंद किशोर त्यागी भूमिकामे आयुष्मान सक्सेना, जो शानू का छात्र है। रसभरी के बारे में खबर सुनकर, वह शानू को प्रभावित करने की कोशिश करता है ताकि वो रसभरी के साथ प्रेम संबंध बना सके।इन दो किरदारों के साथ रश्मि आगडेकर (प्रियंका – नंद की प्रेमिका); प्रद्युम्न सिंह (नवीन – शानू का पति) और नीलू कोहली (पुष्पा – नंद की माँ) की भी मुख्य भूमिकाएँ हैं।इसके अलावा नंद के दो दोस्त, नंद के पिता, पप्पू केबलवाला, पुष्पा की ५-६ दोस्त, प्रियंका की दो दोस्त, शानू और नवीन के माता-पिता, पानवाला इन छोटी छोटी भूमिकाओं में अलग-अलग कलाकार हैं। स्वरा को छोड़कर बाकी सभी ने अच्छा अभिनय किया है। शीर्षक भूमिका की वजहसे स्वरासे बहुत उम्मीदें रहेती हैं, शायद इसलिये भ्रमनिरास होता है। इसमें शानूका बात करने का सूर अजीब है और परेशान करता है। पुष्पा और उसके दोस्त का पात्र विनोदी है और बीच-बीच में हंसाते रहते है।

मेरठ में नौकरी के लिए आयी शानू भूत-प्रेत की शिकार या कई व्यक्तित्व विकारों से ग्रस्त (इसे क्या समझना है वह हमारे ऊपर है)। बीच बीच में शानू अचानक रसभरी में परिवर्तित होती है और विभिन्न पुरुषों के साथ प्रणय करती है।यह अफवाह / सच्ची खबर पूरे शहर में जंगल की आग की तरह फैलती हैं। शहर के पुरुष उसके पीछे पागल हो जाते हैं।नंद रसभरी के साथ प्रणय करने का फैसला करता है और ऐसा मौका पाने के लिए वह शानू के घर अंग्रेजी सिखने जाना शुरू करता हैं। शानू के पति को शानू के बिमारी/स्थिती के बारे में पहले से ही पता रहता है और वो नंद को अपने और शानू के अतीत के बारे में सबकुछ विस्तृतसे बताता है। इसके बाद, नंद सच्चाई का पता लगाने की कोशिश करता है।इस बीच, शानू नंदको अंग्रेजी के साथ-साथ शिष्टाचार और सम्मान करना भी सिखाती है। इस वजहसे जब मौका आता है, शानू के सम्मान और प्रियंका के प्यार के वजहसे, वह रसभरी के साथ कुछ नहीं कर पाता या नही करता हैं। नंद, पुष्पा और शहर की अन्य महिलाओं द्वारा शानू को मार-मार कर शहरसे बाहर निकालने की साजिश से शानूको बचाता हैं साथही उसे और उसके पती को सुरक्षित शहर से बाहर भेज देता हैं ।शानू/रसभरी के बारे में जो सवाल दिमाग में आते हैं उनके जवाब मिलते हैं, लेकिन वे जवाब अधिक ज्यादा भ्रमित कर उलझन में डालते हैं।अंत मीठे छोटे आश्चर्य और कुछ अनुत्तरित मुद्दों के साथ किया गया है। जो अगले सीज़न के लिए सजाया गया मंच हो सकता है।

निर्देशक और निर्माता ने प्रणय और विवाद (विभिन्न कारणों से चर्चा में रहनेवाले व्यक्ति को मुख्य भूमिका देकर) के माध्यम से प्रसिद्धि और दर्शक हासिल करने की कोशिश की है। लेकिन पुरी तरहसे विफल हो गये। कुछ दृश्य कहानी के साथ अप्रासंगिक, असंबंध लगते हैं।

उत्पाद प्रक्षपित करने का तारीख निकट है और उत्पाद तैयार नहीं है। फिरभी निर्धारित तिथि से पहले उत्पाद प्रक्षपित करके प्रबंधन टीम (अमेझान) को खुश किया जाता है।कोई फर्क नहीं पड़ता कि उत्पाद (रसभरी) में कितनी समस्याएं या दोष हैं और उपभोक्ता इससे कितने परेशान होगे। यह श्रृंखला इसका जीता जागता उदाहरण है।

आपके पास बहुत समय है और कुछ भी करने (यहां तक ​​कि नींद) या देखने के लिए नहीं। केवल तभी स्वयं के जोखिम पर देखने की हिम्मत कर सकते हैं।

Rasbhari – hindi web series review in marathi रसभरी- मराठी समीक्षा

रसभरी, 30 मिनिट सरासरी लांबीच्या 8 भागांसह जून २०२० मध्ये अमेझॉन प्राइम वर प्रदर्शित झालेली एक हिंदी वेब मालिका. रहस्य-प्रणय-प्रेम-नाटकीय शैलीवर आधारित असलेल्या कहाणीद्वारे प्रेक्षकांचे मनोरंजन करायचा केलेला एक अयशस्वी प्रयत्न.

कथा दोन पात्रांच्या भोवती गुंफलेली आहे, प्रथम स्वरा भास्करने निभावलेली शानू बन्सल शिक्षिका आणि वेश्या रसभरी अशी दुहेरी भूमिका .स्वरा भास्करचे एकूणच नवीन रूप यात बघायला मिळेल. या दोन्ही भूमिकांमधील अभिनय समाधानकारक किंवा तिच्या पूर्वीच्या भूमिकांच्या तोडीचा नाही आहे.दुसरे पात्र नंद किशोर त्यागी भूमिकेमध्ये आयुष्मान सक्सेना, शानूचा विद्यार्थी. रसभरी बद्दल बातमी कळताच, प्रेमसंबधासाठी शानूला प्रभावित करण्याचा प्रयत्न करतो. या दोन पात्रासह रश्मी आगडेकर (प्रियंका – नंदची प्रेयसी), प्रद्युमन सिंग (नवीन – शानुचा नवरा) आणि नीलू कोहली (पुष्पा – नंद ची आई) यांच्या पण मुख्य भूमिका आहेत. या व्यतिरिक्त लहान लहान भूमिकेमध्ये नंदचे दोन मित्र, नंदचे वडील, पप्पू केबलवाला, पुष्पाच्या  ५-६ ते मैत्रिणी, प्रियांकाच्या दोन मैत्रिणी, शानू आणि नवीनचे आई-वडील, पानवाला असे वेगवेगळे अभिनेते आहेत.  स्वरा वगळता प्रत्येकाने चांगला अभिनय केला आहे. शीर्षक भूमिकेमुळे असलेले जास्त अपेक्षेचं ओझे ती पेलू शकली नाही सोबतच शानूसाठी वापरलेली बोलण्याची लकब थोडी त्रासदायक किंवा चिडचिड करवणारी आहे. पुष्पा आणि तिच्या मैत्रिणी यांचे पात्र विनोदी आहे आणि मध्ये मध्ये हसवत राहतात.

मेरठ शहरात नौकरी साठी आलेल्या शानू, भूतानी पछाडलेली किंवा एकाधिक व्यक्तिमत्त्वाच्या विकृतीने ग्रासलेली (आपण त्याला काय समजतो हे आपल्यावर अवलंबून आहे) हा मूलाधार असलेली कथा. शानू अचानक रसभरी मध्ये परिवर्तित होते आणि वेगवेगळ्या पुरुषांशी प्रणय किंवा प्रेमसंबंध प्रस्थापित करते.ही अफवा/सत्य बातमी आगीसारखी सर्व शहरात पसरते आणि शहरातील पुरुष तिच्या मागे पागल होतात.नंद रसभरी सोबत प्रणय करण्याचा विचार करतो आणि तशी संधी मिळवण्यासाठी,तो शानू कडे इंग्रजीची शिकवणी लावतो. शानूच्या नवऱ्याला तिच्या या विकृती / पछाडण्या बद्दल माहित असते आणि तो नंदला तिच्या भूतकाळाबद्दल सर्व काही सविस्तर सांगतो.सत्य कळल्यानंतर नंद यामागचं गूढ शोधण्याचा प्रयत्न करतो. दरम्यान शानू त्याला इंग्रजी सोबतच शिष्टाचार,आदर करणे पण शिकवते. त्यामुळे जेव्हा संधी मिळते तेव्हा शानूबद्दलचा आदर आणि प्रियंकावरील प्रेमामुळे तो रसभरी सोबत काही करू शकत नाही किंवा करत नाही. पुष्पा आणि शहरातील अन्य स्त्रियांनी, शानूची धींड काढून शहराबाहेर हाकलून लावण्याच्या केलेल्या कटापासून नंद त्यांना वाचवतो आणि सुरक्षित शहराबाहेर पाठवतो.शेवटी शानू/ रसभरी बद्दल उत्तरे मिळतात पण ते अधिक जास्त बुचकळ्यात टाकून गोंधळ निर्माण करतात.नवीन गोड छोट्या आश्चर्यांसह केलेल्या शेवटामुळे आणि अन्य काही अनुत्तरित राहलेले किंवा ठेवलेले मुद्दे कदाचित पुढच्या सीजनसाठी तयार केलेला मंच असू शकते.

दिग्दर्शक आणि निर्मात्याने प्रणय, प्रेमसंबंध आणि विवाद, वादंगातून (विविध कारणांमुळे चर्चेत असलेल्या व्यक्तीला मुख्य भूमिका देवुन) प्रसिद्धी, प्रेक्षक मिळवण्याचा प्रयत्न केला आहे परंतु ते पूर्णपणे अयशस्वी ठरले. काही दृश्य तुम्हाला एकदमच कथेशी अप्रासंगिक/असंबद्ध वाटतील.

एखाद्या उत्पादनाची प्रक्षेपण करण्याची अंतिम तारीख जवळ आली आहे आणि उत्पादन तयार नाही. म्हणून मग उत्पादनामध्ये (रसभरी) किती समस्या अथवा दोष आहेत याचा फरक पडत नाही आणि ठरलेल्या तारखेआधीच हे उत्पादन प्रक्षेपित करून व्यवस्थापक मंडळाला (अ‍ॅमेझॉन) आनंदी केले जाते परंतु  उपभोक्त्याला यामुळे त्रास होणार याचा काही विचार केला जात नाही. ही मालिका याचा जिवंत उदाहरण आहे.

तुमच्याकडे भरपूर वेळ आहे आणि काहीच म्हणजे काहीच (झोप पण) करण्यासारखे, बघण्यासारखे नाही तेव्हाच बघण्याची जोखीम आपण स्वबळावर पत्करू शकता.

Rasbhari – hindi web series review in english

Rasbhari, a hindi web series with 8 episodes of average length 30 minute streaming since Jun 2020 on Amazon prime. A failed try of entertainment with story plot of suspense-drama-love-sex-intimacy

Story revolves around two characters. First one, a double role played by Swara Bhaskar as Shanoo bansal (a teacher) and Rasbhari (a prostitute). In both roles are a total new form of Swara Bhaskar but acting is not up to the mark. She was not able to match the level of entertainment and acting to her previous roles. Second lead character Nand Kishore Tyagi played by Ayushmaan Saxena, a student of Shanoo. After hearing news about Rasbhari, he tries to impress her for lovemaking. Along with these two Rashmi Agdekar as Priyanka (Nand’s girlfriend); Pradhuman Singh as Naveen (Shanoo’s Husband) and Neelu Kohli as Pushpa (Nand’s mother) are some other major characters with small small character roles of Nand’s two friends, his father, pappu cablewala, Puspha’s 5-6 friends, Priyanka’s two friends, Paanwala, Shanoo and Naveen’s parents etc. Except Swara everybody else did well in acting. Swara is playing the title role so expectation from her is more. Her tone as Shanoo is a bit irritating. Scenes of Pushpa along with her friends are humorous and gives some moments of fun. 

Story based in Meerut city and revolves around Rasbhari, the ghost or multiple personality disorder of Shanoo (depends on you, how you take it). Sometime Shanoo suddenly changes to Rasbhari and gets intimate with the various males of Meerut. This rumour/ truth spread like a fire and all the males from the city get crazy about her. To get the opportunity of love making with Rasbhari, Nand start visiting Shanoo’s home for private tuition. Shanoo’s husband knows everything about her condition and he discuss this in detail with Nand. After knowing the truth about Rasbhari, Nand tries to find the reallity. During this Shanoo teaches him english as well as manners also. So when the opportunity of lovemaking with Rasbhari knocks the door,he ignores it because of the respect for teacher Shanoo and his love for Priyanka. Finally he saves Shanoo from Pushpa and the city women who tries to throw her out of the city. At the end Nand gets an answer about Shanoo and Rasbhari but confuses us more. Maybe intentionally kept some open ends along with a small sweet surprise at the end is a platform for next season.

Director and producer tried to get publicity for a web series by sexual content and controversy (lead role given to a person who is in the news for various reasons) but somehow both ideas failed. Some scenes are irrelevant to the storyline.

Entire web series is a perfect example of achieving the deadline of a product launch. Doesn’t matter how many issues or problems there are in the product (Rasbhari) but you launch the product before the due date and make the management (Amazon) happy, letting the customer suffer. 

You can watch it, if you have plenty of time and nothing to watch or do (not even sleep).

Homecoming season 1 review – हिंदी में समीक्षा

Homecoming सीजन १, ३० मिनिटके १० भाग और रहस्य-रोमांचक-नाटकीय शैली कि कथावाली वेब श्रृंखला नवंबर २०१८ मे अमेज़न प्राइम पर प्रदर्शित की गई।

वाल्टर क्रूज़ (स्टीफन जेम्स), व्यक्तिगत पसंदीदा पात्र कॉलिन बेलफास्ट (बॉबी कैनवले) और थॉमस कैरास्को (शी विघम) के साथ प्रीटी वूमन जूलिया रॉबर्ट्स द्वारा निभाई गई हायडी बर्गमैन कि केंद्रीय मुख्य भूमिका,कहानी इन चार मुख्य पात्रों के इर्द-गिर्द घूमती है। वाल्टर क्रूज़ ने सेवानिवृत्त युवा सैनिक की छोटी भूमिका में शानदार काम किया। थॉमस कैरास्को ने एक जांच अधिकारी के रूप में अपनी भूमिका बढिया और सटीक निभाई है। हायडी  बर्गमैन होमकमिंग कि केंद्र प्रमुख या पर्यवेक्षक और एक मनोवैज्ञानिक हैं। प्रिटी वुमन के अद्भुत अदाकारी के बारे में बात करने की जरूरतही नहीं है। कॉलिन बेलफास्ट, होमकमिंग में हायडी की भर्ती करनेवाला हायडी का बॉस और गाइस्ट(होमकमिंग कार्यक्रम शुरू करने वाली या स्वामित्व वाली संस्था) को आनेवाली समस्याओं / सवालोंको को कानूनी या अवैध रूप से हल करनेवाले की नकारात्मक भूमिका। कॉलिनने शांत,साहसी,कपटी खलनायक की भूमिका बहुत बढिया निभाई है।अन्य छोटी भूमिकाओं में क्रेग (एलेक्स कारपोव्स्की),होमकमिंग मे हायडी का सहायक, एलेन बर्गमैन (सिसी स्पेस) हायडी की मां, ग्लोरिया मोरिसु (मैरियन जीन-बैप्टिस्ट) वॉल्टर की मां के साथ अन्य छोटी-छोटी भूमिकाओ वाले अलग अलग पात्र भी हैं।

सेवानिवृत्त युवा अमेरिकी सैनिक के लिए, एक रसायन निर्माता संस्था गाइस्ट द्वारा शुरू किया गया छह सप्ताह का कार्यक्रम “होमकमिंग” कहानी का मुलाधार है।कहानी इसी कार्यक्रम को केंद्रबिंदू बनाकर इसके इर्दगिर्द बुनी गायी है। गोलीबारी, रक्तपात, हिंसा,आंखों के सामने दोस्तों / सहयोगियों की मृत्यु जैसी बुरी, भयानक, हिंसक यादो के साथ युद्ध के मोर्चे से युवा सैनिक सेवानिवृत्त होते है। वो लोग सामाजिक जीवन में आसनीसे समाविष्ट हो सके,सामाजिक जीवन व्यतीत करते वक्त उन्हे कोई तकलीफ ना हो, भयानक यादें उनके सामाजिक जीवन को प्रभावित ना करे इसलिये उनको सुनियोजित तरीकेसे सामाजिक जीवन में लाने के लिए सैनिकों को मानसिक रूप से स्थिर होने में मदद या शिक्षित करना इस प्राथमिक दार्शनिक उद्देश्य के साथ शुरू किया कार्यक्रम “होमकमिंग।बुरी यादों से छुटकारा पाने और मानसिक रूप से तैयार होने के लिए युवा सैनिकको शहर के बाहर आलिशान,सभी बुनियादी सुविधाओं के साथ आरामदायक, शानदार घर में सुखी, शांत और सामान्य नागरिक जीवन जीने के पाठ पढ़ाये जाते है और उन्हे मानसिक रूप से तयार किया जाता है।यह एक स्वेच्छा से प्रवेश करनेवाला कार्यक्रम है।लेकिन एक बार स्वेच्छासे घर के परिसर में प्रवेश करने के बाद सैनिकों को बाहर जाने कि या किसीको उनसे से मिलने-जुलने की अनुमति नहीं होती।भोजन,मनोरंजक खेल,प्रेरनादेनेवाले सत्र, मनोरोग एवं मनोवैज्ञानिक अध्ययन, एक नागरिक के रूप में भूमिका निभाते हुए सामाजिक जीवन का व्यवहार, दोस्तो से बातचीत जैसे चीजो का शिक्षण और सराव, और इसी तरह के आवश्यक सत्र सैनिकों के लिए होमकमिंग में ही आयोजित किए जाते हैं।कार्यक्रम शुरु होने के दिन से इस सभी सत्र के दौरान, सैनिकों और उनके व्यवहार ,बातचीत आदि पर बहुत कडी नजर रखी जाती है और उसको ध्यान में भी रखा जाता है।
वाल्टर,सामान्य नागरिक जीवनहेतू खुद को सक्षम बनाने के लिए होमकमिंग मे स्वेच्छासे आनेवाले युवा सैनिकों में से एक हैं। वह इस कार्यक्रम को लेकर सकारात्मक हैं और कार्यक्रम के दौरान खुदमे सुधार के संकेत भी दिखाता हैं। हायडी पर्यवेक्षक और मनोवैज्ञानिक के तौरपर होमकमिंग में काम देखती हैं। क्रेग सैनिकों को विभिन्न भूमिकाओ द्वारा सामान्य जीवन में व्यवहार करना, बोलना, रहना सीखाता है, साथ ही हायडी का सहायक और होमकनिंग में कॉलिन का खास आदमी (जासूस) के रूप में काम करता है। कॉलिन “होमकमिंग” की अवधारणा का निर्माता हैं और वहा के सभी काम, लोग, योजनाओं को नियंत्रित करता हैं। थॉमस डीओडी के माध्यम से होमकमिंग के बारे मे आयी शिकायत की सत्यता की जांच करता है।

होमकमिंग के पीछे छिपा उद्देश्य क्या है? उनकी सेवानिवृत्त युवा सैनिकों से क्या उम्मीदे हैं? गाइस्ट जैसी रसायन बनानेवाली कंपनीकि होमकमिंग जैसी अवधारणा में क्यों दिलचस्पी है, कंपनी इसमें निवेश क्यों करती है, कंपनी को इससे क्या लाभ होने की उम्मीद है? वास्तव में वाल्टर के साथ क्या होता है, उसपर इसके क्या परिणाम होते हैं, यहसब कैसे समाप्त होता है? वाल्टर की माँ को होमकमिंग पर  संदेह क्यों आता है? इस सब में हायडी की भूमिका क्या है?हायडी अंतमें वाल्टर और कॉलिन के साथ क्या करती है? उसके परिणाम क्या होते हैं? जब उसे होमकमिंग का असली उद्देश्य पता चलता है तो वो क्या करती है, या इसकि उसके पास पहले से ही जानकारी होती है? कॉलिन,रेसेपशनिस्ट हायडी को मनोवैज्ञानिक या पर्यवेक्षक के रूप में क्यों नियुक्त करता है, वह हायडीको कैसे प्रभावित करता है और हायडीसे वो सबकुछ कैसा करवाता जो वह करना चाहता है? कॉलिन का होमकमिंग और गाइस्टपर प्रभाव या वर्चस्व कैसे खत्म होता है? होमकमिंग में आने वाले सैनिकों का इलाज कैसे किया जाता है? वहां सहीमें उनके साथ क्या होता है? होमकमिंग सैनिकों की बुरी यादों से छुटकारा देने के लिए, उन्हें नागरिक जीवन या मुख्य उद्देश्य के लिए तैयार करने के लिये कैसे काम करती है? इस सब कौन कौन शामिल है?अंत में होमकमिंग का क्या होता है? और सबसे महत्वपूर्ण बात थॉमस शिकायत को कैसे ट्रैक करता है, कैसे पता लगाता है कि होमकमिंग में क्या हुआ था? और इसी तरह के कई सवालों के जवाब होमकमिंग सीजन १ के १० भागो में दिए जाएंगे।

बौद्धिक-मानसिक-रोमांचक-नाटकीय कहानियां पसंद हैं तो यह वेब श्रृंखला अवश्य देखनी चाहिए । कॉलिन और थॉमस ने कहानी को बहुत रोमांचक, रोचक और मनोरंजक बनाया है।हायडी कि उपस्थिती ने इसे और भी देखने लायक और पैसा वसूल बनाया है।

Homecoming season 1 review – मराठी मध्ये समीक्षा

Homecoming हंगाम १, नोव्हेंबर २०१८ मध्ये अमेझॉन प्राइम वर प्रदर्शित झालेली वेबसिरीज. सरासरी ३० मिनिट लांबीचे १० भाग असणारी रहस्य-गूढ- रोमांचक-नाटकीय शैली असलेली कथा.

वॉल्टर क्रूझ (स्टीफन जेम्स), माझे वैयक्तिक आवडते पात्रे कॉलिन बेलफास्ट (बॉबी कॅनव्वाले) आणि थॉमस कॅरॅस्को (शी व्हिघॅम) यांच्यासोबतच मध्यवर्ती मुख्य भूमिका हायडी बर्गमन जी प्रीटी वूमन ज्युलिया रॉबर्ट्सने साकारलेली आहे, या चार प्रमुख पात्रांभोवती गुंफलेली हि कथा आहे. वॉल्टर क्रूझने निवृत्त तरुण सैनिकाच्या छोट्या भूमिकेत चांगले काम केले. थॉमस कॅरॅस्कोने तपास अधिकाऱ्याच्या भूमिकेमध्ये उत्तम कामगिरी केली. हायडी बर्गमन होमकमिंगच्या केंद्र प्रमुख किंवा पर्यवेक्षक आणि मानसशास्त्रज्ञच्या मुख्य भूमिकेत आहे. प्रीटी वूमनच्या अप्रतिम अभिनयाबद्दल बोलायला शब्दांची आवश्यकता नाही. कॉलिन बेलफास्ट होमकमिंगमध्ये हायडीची भरती करणारा हायडीचा बॉस आणि गाईस्ट (होमकमिंग कार्यक्रम सुरु करणारी किंवा मालकी हक्क असणारी संस्था) च्या समोर येणाऱ्या समस्या/प्रश्नांचे कायदेशीर किंवा बेकायदेशीररित्या निवारण करणाऱ्याच्या नकारात्मक भमिकेमध्ये आहे. कॉलिनने एक शांत,धैर्यवान, कुटील खलनायकाची भूमिका उत्तम साकारली.इतर लहान लहान भूमिकेमध्ये क्रेग (अ‍ॅलेक्स कारपोव्हस्की) होमकमिंग मध्ये हायडीचा सहाय्यक, एलेन बर्गमन (सिसी स्पेस्क) हायडीची आई, ग्लोरिया मॉरिस्यू (मारियान जीन-बॅप्टिस्टे) वॉल्टरची आई, सोबतच अजून काही लहान लहान भूमिका देखील आहेत.

एक रसायन उत्पादक संस्था गाईस्ट द्वारा अमेरिकन निवृत्त तरुण सैनिकांसाठी सुरू करण्यात आलेला ‘होमकमिंग’ हा ६ आठवड्याचा कार्यक्रम कथेच्या केंद्रस्थानी आहे. गोळीबार, रक्तपात, हिंसा, मित्र/सहकारी यांचे डोळ्यासमोर झालेले मृत्यू अशा अनेक वाईट, भयानक, हिंसक आठवणीने युद्धाच्या मोर्चातून सेवा निवृत्त झालेल्या तरुण वयाच्या सैनिकांना सहजरित्या सामाजिक जीवनात वावरता यावे, समाविष्ट होता यावे आणि या भयंकर आठवणींचा त्यांच्या सामाजिक जीवनावर परिणाम न होता त्यांना शांत सुनियोजित जीवन जगात यावे आणि यासाठी सैनिकांना मानसिकरित्या स्थिर करण्यासाठी लागणारी मदत किंवा शिक्षण देणारी संस्था असा प्राथमिक दर्शनी उद्देश्य दाखवून सुरु करण्यात आलेला “होमकमिंग” हा कार्यक्रम. मानसिकरित्या तयार करण्यासाठी आणि वाईट आठवणीमधून बाहेर काढण्यासाठी,निवृत्त सैनिकांना शहराबाहेर सर्वसुखसोयीने समृद्ध, पायाभूत सुविधा सोबतच चैन,ऐषोआरामदायक असलेल्या घरामध्ये, नवीन आयुष्याला आनंदाने, शांतपणे सामोरे जाण्याचे आणि नागरी जीवनाचे धडे देण्यात येतात.हा स्वखुशीने भाग घेण्याचा कार्यक्रम पण एकदा घराच्या परिसरामध्ये प्रवेश केल्यानंतर भाग घेतलेल्या सैनिकांना बाहेर जाण्याची किंवा कुणी आत सैनिकांना भेटायला येण्याची परवानगी नसते.सैनिकांसाठी आतमध्येच अन्न,मनोरंजक खेळ,प्रेरणा देणार सत्र, मानसिक चिकित्सा, मानसशास्त्रीय अभ्यास, नागरीक म्हणून भूमिका बजावणे,समाजात वावरणे, मुलाखत देणे, मित्रांसोबत वागणे, बोलणे आणि इतर आवश्यक सत्र आयोजित केले जातात.या दरम्यान सैनिकांवर, त्यांच्या वागण्यावर वगैरे सतत लक्ष्य ठेवण्यात येते.

वॉल्टर हा स्वत:ला नागरी जीवनाकरिता सक्षम बनवण्यासाठी स्वखुशीने होमकमिंगला येणाऱ्या तरुण सैनिकांपैकी एक असतो जो तिथल्या कार्यक्रमाला सकारात्मक प्रतिसाद देतो आणि सुधारणेचे लक्षण दाखवतो.हायडी त्यांची पर्यवेक्षक व मानसशास्त्रज्ञ म्हणून होमकमिंग मध्ये काम बघते. क्रेग तिथे सैनिकांना सामान्य आयुष्यातील वेगवेगळ्या भूमिका करायला सांगून त्यांचा वागण्याचा, बोलण्याचा, राहण्याचा सराव करून घेतो सोबतच हायडीचा मदतनीस आणि कॉलिनचा होमकमिंग मधील खास माणूस (गुप्तचर) म्हणून काम बघतो. कॉलिन ‘होमकमिंग’ या संकल्पनेचा निर्माता आहे आणि तिथलं सर्व कार्य,लोक, योजनांना नियंत्रित करतो.वॉल्टरच्या आईला होमकमिंगमध्ये सैनिकांना देण्यात येणाऱ्या वागणुकीबद्दल, घडणाऱ्या कार्याबद्दल संशय येतो आणि म्हणून त्या होमकमिंगबद्दल डीओडीकडे तक्रार करतात. थॉमस हा डिओडी मार्फत तक्रारीच्या सत्यतेचा तपास करतो.

होमकमिंगचा मागचा छुपा उद्देश्य काय असतो? निवृत्त तरुण सैनिकांकडून त्यांची काय अपेक्षा असते? गाइस्ट सारख्या रसायन बनवणाऱ्या कंपनीला होमकमिंगसारख्या संकल्पनेमध्ये स्वारस्य का असते? कंपनी त्यात गुंतवणूक का करते आणि कंपनीला त्यातून काय फायदा अपेक्षित असतो? वॉल्टर सोबत नक्की काय घडते, त्याचे परिणाम काय होतात, त्याचा शेवट कसा होतो ? वॉल्टरच्या आईला होमकमिंगबद्दल संशय का वाटतो? हायडीची यासर्वामध्ये काय भूमिका आहे?शेवटी ती वॉल्टर, कॉलिन सोबत काय करते? तिला काय परिणाम भोगावे लागतात? तिला होमकमिंगच्या खऱ्या उद्देश्याबद्दल,वास्तविकतेबद्दल कळते तेव्हा ती काय करते कि तिला आधीपासूनच सर्व माहिती असते? कॉलिन मनोवैज्ञानिक,मानसशास्त्रज्ञ किंवा पर्यवेक्षक म्हणून रिसेप्शनिस्ट हायडीला का घेतो, तिला कसा प्रभावित करतो आणि त्याला हवे तो तिच्याकडून जसे करवून घेतो?कॉलिनचे होमकमिंग,गाइस्ट मधले प्रभुत्व कसे संपते? होमकमिंग मध्ये आलेल्या सैनिकांना कशी वागणूक देण्यात येते? त्यांच्यासोबत तिथे काय घडते? सैनिकांच्या वाईट आठवणी घालवण्यासाठी आणि त्यांना नागरी जीवनासाठी किंवा मुख्य हेतूसाठी कसे तयार करतात आणि यासाठी होमकनिंग कसे काम करते? यामध्ये कोण कोण सामील असते? सरतेशेवटी होमकमिंगचे काय होते? आणि सर्वात महत्त्वाचे म्हणजे थॉमस तक्रारीचा मागोवा कसा घेतो, होमकमिंगमध्ये काय घडले होते हे कसे शोधून काढतो? अशा बऱ्याच प्रश्नांची उत्तरे होमकमिंग हंगाम १ च्या १० भागांमध्ये नक्कीच मिळतिल. 

बौद्धिक-मानसिक-रोमांचक-नाटकीय कथा आवडत असल्यास हि वेब सीरीज अवश्य बघण्यासारखी आहे.कॉलिन आणि थॉमस मुळे कथा खूप रोमांचक आणि मनोरंजक बनली आहे. हायडी ने त्यात भर टाकून ती पाहण्यासारखी आणि पैसा वसूल बनवली आहे.

Homecoming season 1 review – review in English

Homecoming season 1 was released on Amazon prime in Nov 2018 with 10 episodes of an average length of 30 minutes. The story is of the suspense-drama-thriller genre.

The story revolves around major 4 characters, Walter Cruz (Stephan James), my personal favorite Colin Belfast (Bobby Cannavale), and Thomas Carrasco (Shea Whigham) with central pivotal character Heidi Bergman played by pretty woman Julia Roberts. Walter Cruz did well in his small role as an ex-military man. Thomas Carrasco played the role of investigating officer and did a great job. Heidi Bergman is in the pivotal role of homecoming facility head or supervisor.No words for pretty women awesome acting. Colin Belfast is in the negative role of a boss and recruiter of Heidi in the Homecoming facility and problem solver for the Geist (a company that owns Homecoming facility). Colin played an awesome calm villain role. Some other small characters are also in important roles like Craig (Alex Karpovsky) assistant to Heidi, Ellen Bergman (Sissy Spacek) Heidi’s mother, Gloria Morisseau (Marianne Jean-Baptiste) Walter’s mother with some other small character roles.

The story is about a chemical manufacturing company, Geist launch a 6-week program called “Homecoming” with a visible motto of helping US military veterans of young age to adjust to civil society after retiring from the war front with some bad memories of killing and witnessing deaths of friends and colleagues. Homecoming facility located somewhere outside the city and with well-developed infrastructure. It is a volunteer program and people are not allowed to go out once entered and visitors are also not allowed. Food, some grooming sessions, mental therapy, psychological study, role play as a civilian, interviewee, and friends sessions are held in the Homecoming facility for the veterans. During this veterans and their behavior is under observation and noted continuously. 

Walter is one of the young volunteer veterans from the batch of 18 visiting Homecoming, who respond to the program positively and show signs of positive change. Heidi is their supervisor cum psychologist. Craig is a role play teacher and a special man of Colin in the facility. Colin is the creator of the idea ‘Homecoming’ and takes care of and controls the facility. Walter’s mother gets some suspicious feelings about the facility, their activities so she complains about it to DOD. Thomas investigates the truthfulness of the complaint.

What is the hidden motto of the Homecoming and what do they expect from these veterans? Why are a chemical company like Geist interested in the program Homecoming and why the company invests in it? What benefits does the company is aiming for? What happens to Walter? Why did Walter’s mom get suspicious about the facility? What role Heidi plays in it? What she does when she knows about the reality of Homecoming? Why did Colin recruit receptionist Heidi as a psychologist or facility supervisor and influence her? How colins mastery ends? How does Homecoming treat the veterans? How does Homecoming work to delete bad memories and make them prepared for city life or for another main purpose? Who all are involved in it? Finally what happens to the facility? Most importantly how Thomas tracks back the complaint and finds out what happened at Homecoming? and many more questions will be answered in all 10 episodes of Homecoming season 1.

Must watch the web series if you like psychological thriller dramas. Colin and Thomas really made it entertaining and thrilling. Pretty women’s presence as Heidi changed it to worth watching

Triggers – sparking positive change and making it last by Marshall Goldsmith Book Review – Hindi ( ट्रिगर्स -पुस्तक समीक्षा )

मार्शल गोल्डस्मिथ, एक उत्तम जीवन प्रशिक्षक और उतने ही अच्छे शिक्षक, जो मुख्य रूप से प्रबंधन टीम, प्रबंधन टीम के उच्च पदस्थ लोग, भविष्य के नेता, वर्तमान के नेताओं के नेतृत्व विकास कार्यक्रम के प्रबंधक/प्रशिक्षक के रूप में काम करते है, उन द्वारा लिखित ये किताब। किताब में उनके कुछ पक्षकारो की सफलता, विफलता और अधूरे कार्यक्रम छोडने के मिसालो के साथ-साथ उनके संबंधित कहानिया, तकनीक, प्रेरणा, प्रयास, अपेक्षित परिवर्तन, विकास,लक्ष्य आदि का उल्लेखभी किया गया है।

व्यक्तीका व्यवहार, आचरण या दृष्टिकोण मुख्य रूप से दो बातो से प्रभावित होते हैं: Environment (आस-पास के लोग, परिस्थिति, वातावरण आदि) और Trigger (भावना जो प्रतिक्रिया / कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं)। विभिन्न स्थितियों में व्यक्तीका आचरण,संवाद, प्रतिक्रिया मे बदलाव समझाने के लिए विभिन्न संदर्भोंमे इन दो संज्ञाओ का उपयोग किताब मे बार बार किया गया है ।Environment मुख्य चीज है जो किसी विशेष स्थिति में व्यक्ती के व्यवहार/संवाद/प्रतिक्रिया को नियंत्रित करती है। एक ही व्यक्ती विभिन्न Environment में एक ही परिस्थिति मे अलग-अलग प्रतिक्रिया/संवाद करते हैं।Trigger व्यक्ति को(अच्छे या बुरे) कार्य/प्रतिक्रिया करने के लिए प्रेरित करता है। Trigger प्रेरणा या प्रभाव की भूमिका निभाता है जो व्यक्ति से कार्य करवाता है या कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।

किताब का मुख्य लक्ष्य व्यक्ति के व्यवहार, व्यवहार में सुधार के साथ उसके प्रगति, विकासपर है। ताकि व्यक्ति स्थिर और प्रगतिशील व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत जीवन जी सके। किताब में बताये गये उपाय/ तकनीक लोगों को अपने व्यावसायिक जीवन को विकसित, गतीमान, अग्रिम करने या व्यक्तिगत जीवन में संतुलन बनाने में मदद करेंगे या मार्गदर्शन करेंगे। किताब में कुछ उपयुक्त, रोचक, आकर्षक और प्रासंगिक उदाहरणों का भी उल्लेख है।

किताब का मुख्य विषय है भविष्य या वर्तमान नेताओं / मार्गदर्शकों / अग्रदूतों (विशेष रूप से कंपनी या संगठन के) का विकास, सुधार या विशिष्ट पद के लिये जरूरी कमियों को दुर कर उनको उस पद के सक्षम बनाना है (लेकिन कोई भी व्यक्ती खुद की  व्यावसायिक और व्यक्तिगत उन्नति के लिए किताब में उल्लिखित तकनीकों का उपयोग कर सकता है)। मार्गदर्शक /नेताओं को कैसे शांत और संयमित रहना चाहिए; खुदको कैसे नियंत्रित रखना चाहिए; आजुबाजु कि परिस्थिती,लोगो अनुसार व्यवहार या आचरण कैसे करना चाहिए;बातचीत; संवाद; स्वयः-विकास और इसी तरह कि कई तकनीकें किताब बतायी गयी है।

एक और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि किताब में उल्लिखित उपाय/ तरीके / तकनीक को बिना अधिक प्रयास और बदलाव के आसानी से स्वयःपर लागू कर सकते है। दिए गए उदाहरण समझने में आसान, पूरक और सरल हैं। किताब में अपने आपसे तथा दूसरों से पूछने के सवालो के तरिके और प्रकार; अधिक नियोजित तरीके से काम कैसे करें और इसके लाभ; अपने आपसे बेहतर कैसे प्राप्त करें; बातचीत के सरल तरिके,व्यवहार और इसी तरह के अन्य मुद्दे शामिल हैं। जो व्यक्ति के लिए मार्गदर्शक, मददगार, फायदेमंद हो सकते है।

किताब में उल्लिखित सभी उपायों या तंत्रों को स्वयः पर लागू करना मुश्किल है। लेकिन कम से कम एक तकनीक को अपनाकर,  व्यवहार को बदलने की कोशिश कर सकते है और इससे निश्चित रूप से लाभ होगा (स्वःअनुभव से)।

व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक उन्नति,प्रगती, आत्म-विकास, व्यावसायिक और पारिवारिक जीवन मे वृद्धी, संबंधो मे संतुलन इ. मे मदद और मार्गदर्शन हेतु इस किताब को अवश्य पढ़ें (विभिन्न कंपनियों द्वारा कर्मचारीयोको दिये जानेवाले ४-५ अलग-अलग व्यावसायिक प्रशिक्षण इस किताब में शामिल हैं)।इस किताबसे व्यक्ती उसे जरुरी, सही, पूरक, योग्य सोच अपना सकता है।अगर इस किताब को व्यक्ती सकारात्मक सोच के साथ हाथ मे लेगा तो निश्चित रूपसे प्रगति करने में मददगार साबित होगी।

इस किताब को पढ़ने से पहले ध्यान रखने वाली महत्वपूर्ण बात, इससे व्यक्ती को अपने विचारों को विकसित करने, अपने व्यवहार को बदलने, रिश्तों मे संतुलन बनाने, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत प्रगती के तंत्र और इसी तरह अन्य स्व विकास के मार्ग पता चलेगे। यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके बॉस, पर्यवेक्षक, सहकर्मी, सहचारी, अधीनस्थ, साथी, पत्नी, रिश्तेदार या किसी और को इसे पढ़कर बदलने की जरूरत है और स्वयः को नही, तो इस किताब को हाथ में लेकर अपना समय बर्बाद न करे।

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